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ये कैसी अखिल भारतीय कायस्थ महासभा है जो अपने किसी पदाधिकारी के भर्ष्टाचार के कारण प्रताड़ित होने पर जान देने के बाद चुप है ?

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा या फिर यु कहा जाए की कायस्थों का सबसे पुराना संगठन जिसके प्रणेता कभी देश के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न राजेन्द्र बाबु हुआ करते थे I उसी महासभा से बरसो से जुड़े एक पदाधिकारी ने मंगलवार को पी डव्लू डी के आफिस में जाकर खुद को गोली मार ली I

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बाद में उनकी गाडी से मिले ६ पेज के स्युसाइड नोट में तमाम आरोप लगाये गये है की कैसे बीते १० सालो से तमाम सरकारों के बदलने के बाबजूद उनका पैसा आज तक नहीं मिला , लगभग 4.५ करोर का जीर उस पत्र में है I  अब ऐसे में इतनी बड़ी घटना के बाद किसी भी समाज में अब तक उबाल आ जाना चाहए था , सडको पर संगठन के कार्यकर्ता दिखने चाहए थे I संगठन को तमाम एनी संस्थाओं के साथ मिलकर राजनैतिक दबाब बनाने की कोशिश करनी चाहए थी I कोई ऐसा प्रयास दीखता जिसके बाद ये समझ आता की इस गह्तना पर कायस्थ समाज को कोई फर्क भी पड़ा है या फिर यूँ कहूँ की वो इससे आक्रोशित है पर आप आक्रोशित तो छोडिये समाज और अखिल भारतीय कायस्थ महासभा जैसे संगठनो की प्रतिक्रिया देख कर ये महसूस किया जा सकता है कि उनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ा

किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष , महामंत्री की इस सब पर सवाल करने की कोशिश तो छोडिये चिंता भी नहीं दिखाई दी I अब ऐसे में सवाल ये है की आखिर इन संगठनो की उपयोगिता क्या है ? अरे भाई अवधेश श्रीवास्तव आपके ही बड़े बड़े संगठनो के पदाधिकारी थे I आम आदमी की तो बात अलग होती जब आप उनके लिए खड़े नहीं हो पा रहे है तो किसके लिए खड़े होंगे और कब होंगे

आखिर कहाँ हैं वो कायस्थ पाठशाला और महासभाए  जो दम भरती है कायस्थों के खैर खावाह होने के या उनकी लड़ाई लड़ने के I राजनेताओ के लिए शोक सभाए करने वाले कायस्थ कहाँ है ? कायस्थों के संगठनो की ही क्या कहे आपको सोचल मीडिया पर तमाम ५० हजारी ग्रुपों में इस पर कोई सुगबुगाहट दिखी किसी ने वहां कहा हो की  कायस्थों को  इसके लिए आगे आना चाहए , किसी ने मुख्य्मंत्री प्रधानमंत्री को टैग करके पोस्ट ट्वीट किये हो I ये हमारे सोये हुए समाज की नियति है I  समाज को इस मौत से कोई फर्क नहीं पड़ा वो तो मगन है जयकारे लगाने में कोई पक्ष के कोई विपक्ष के I हर कोई चिंतित है अपने नेता के पर अपने समाज के लिए कोई नहीं I

दिव्तीय  विश्वयुद्ध की एक कविता याद रखिये

" पहले वो शहर में आये, लोगो को मारने लगे मैंने कुछ नहीं कहा
फिर वो मेरे मोहल्ले में आये मैं चुप रहा
वो मेरी गली में आये मैंने आँखे बंद कर ली,
जब वो मेरे घर में आये
तब मुझे बचाने वाला कोई नहीं था "

आपकी आज की चुप्पी आपके आने कल के विनाश की कहानी लिख रही है, आज किसी के मरने पर आप चुप हैं कल आपके मरने पर लोग चुप होंगे या फिर यूँ कहा जाए की लोग ही नहीं होंगे आखिर वो ऐसे संगठनो से जुड़ेंगे जिनके नेता अपने लोगो के लिए भी लड़ सकते है
अभी भी वक्त है उठिए, अपने लोगो के लिए लड़िये कुछ नहीं तो इस घटना को शेयर ही कीजिये शायद कुछ और लोग जाग्रत हो जाए

 

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