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कायस्थ सम्मलेन का यथार्थ ? महथा ब्रज भूषण सिन्हा

अभी चारो ओर चर्चा गर्म है कायस्थ सम्मेलनों की. मुझे लगा कायस्थों के अच्छे दिन आ गए. कानपुर सम्मलेन, वाराणसी सम्मलेन और अब भोपाल सम्मलेन? सभी सम्मेलनों में लाखों की भीड़ का दावा. करोड़ों का खर्च का अनुमान. चुन-चुन कर राजनितिक कायस्थ नेताओं को आमंत्रण. कहीं कोई छुट न जाए जैसी सतर्कता. वाह क्या कहने ! फेसबुक एवं व्हाट्स एप्प जैसे सोशल माध्यमों पर लोगों की रात-दिन सक्रियता. कमाल हो गया भाई. हमारी चट्टानी एकता जिन्दा बाद.

दूसरी ओर एक सन्देश बिहार के समाजसेवी डॉ ओंकार नाथ श्रीवास्तव की हत्या पर अबतक कोई कार्रवाई नहीं. राजनितिक कायस्थ नेताओं में कोई प्रतिक्रिया नहीं. हमीरपुर के पीड़ित परिवार कहाँ है कोई पता नहीं. एक गरीब कायस्थ बिमारी के इलाज के लिए एम्स में भर्ती. पर इलाज के खर्च के लिए पैसे नहीं. समाज से सहयोग की अपेक्षा. देश में स्थापित चित्रगुप्त मंदिरों का बुरा हाल. नहीं हो रही सही देखभाल.
इस तरह की विरोधाभाषी खबरें चल रही है. थोड़ी देर के लिए भूल जाएँ, इन सारी खबरों को और आत्म चिंतन करें. क्या हमे करोड़ों रुपये(जैसा की लोग कह रहे हैं) खर्च कर ऐसे आयोजन करने चाहिए जिससे आम कायस्थ को कोई लाभ न हो? कायस्थों के बेहतरी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं हमारे आराध्यदेव भगवान् चित्रगुप्त मंदिरों की दुरावस्था में होते इतने रुपये सम्मेलनों में खर्च करने की प्रासंगिकता क्या है? यह आयोजन समाज के भले के लिए तो नहीं कहा जा सकता. कायस्थ हित के उद्देश्यों को लेकर देश में सैंकड़ों संस्थाएं कार्यरत है. पर समान उद्देश्य होते हुए भी संगठनों में आपसी एका नहीं है.

अब अपने समाज के राजनितिक नेताओं की बात कर लें तो आप पायेंगे कि अधिकाँश कायस्थ नेता ने कायस्थ समाज को कोई अहमियत नहीं दी. उलटे अपने समाज को ही आरोपित किया कि कायस्थों ने उनकी कोई मदद नहीं की है . बहुत कायस्थ नेता लोग यह कहते नहीं थकते कि वे जात-पात में विशवास नहीं करते. आपके मंच पर आकर ऐसा प्रकट करेंगे मानो उन्होंने कायस्थ समाज पर अहसान कर दिया हो. पर हम इससे आहत बिलकुल नहीं है. क्योंकि कायस्थ संगठन अपने लोग को पुत्रवत मानता आया है. पुत्र कुपुत्र भले ही हो, पिता कु-पिता नहीं हो सकता. हम उन्हें पूछेंगे, समर्थन देंगे, ताकत देंगे. और जरुरत पड़ने पर उनके साथ खड़े दिखेंगे भी. हम राजनितिक ताकत चाहते हैं. राजनीति में अपने जाति का विशेष स्थान भी चाहते हैं. अपनी हिस्सेदारी भी चाहते हैं. इसी उद्देश्य के लिए हम अपने लोगों को प्रोमोट भी करेंगे.

हमे याद रखना होगा कि उद्देश्यहीन कार्यों से लोगों में अविश्वास की भावना बढती है. समाज का कायस्थ पाठशाला छोड़कर अपनी शैक्षणिक संस्थान नहीं, रोजगार हेतु कोई प्रशिक्षण केंद्र नहीं, कोई अतिथिशाला नहीं, सामाजिक कार्यों हेतु विवाह स्थल नहीं. इस तरह हमारा समाज सिर्फ बडबोला और आत्म केंद्रित हो कर रह गया है. अब प्रश्न यह उठता है की क्या हम इन समस्यायों को हल किये बिना सम्मलेन नहीं कर सकते ?

दो वर्ल्ड कायस्थ कांफ्रेंस देखा. दो-दो कायस्थ रथ यात्राएं देखीं. अभी-अभी तीन सम्मलेन पटना में हुए. कायस्थ समागम जिस पर बीजेपी का कार्यक्रम होने का आरोप लगा. कायस्थ महाकुम्भ उन्हें भी राजनितिक आयोजन कहा गया और तीसरा प्रगतिशील बुद्धिजीवी मंच के नाम से श्री विनोद श्रीवास्तव ने आयोजित किया था, जिस पर लालू जी द्वारा दिए गए बयानों की कायस्थों द्वारा तीब्र आलोचना हुई. लेकिन प्रगतिशील बुद्धिजीवी मंच के आयोजन को कायस्थ सम्मलेन नहीं कहा गया. और न ही किसी प्रकार की उस सम्मलेन से कायस्थ अपेक्षाय रही.

एक बात और. इन सम्मेलन के आयोजन में होने वाले खर्च के पैसे कहाँ से आते हैं? अगर कोई एक मुश्त बड़ी राशि देता है तो उसके तुलना में उसे निजी लाभ भी चाहिए.यही कारण है की फायनांसर की नजर कायस्थ एकता, उत्थान या विकास पर केन्द्रित नहीं होती. मंच को चमकदार बनाकर, बड़े-बड़े हस्तियों से निकटता प्राप्त कर अपना अभीष्ट प्राप्त कर लेना ही ऐसे आयोजनों का उद्देश्य हो जाता है और आम लोग कायस्थ के नाम पर देखते रह जाते है. यही यथार्थ है और यह तब तक होता रहेगा जबतक फायनांसर की प्रथा होगी.
सम्मेलन/अधिवेशन का अर्थ क्या है, इसे समझना जरुरी है. सम्मेलन का मतलब संस्थाओं के कार्यक्रम को रेखांकित करना, आय-व्यय की विवरणी समाज के सामने प्रस्तुत करना, अब तक किये गए कार्यों का लेखा-जोखा समाज के सामने रखना, नए कार्यक्रम की रूप रेखा तय करना एवं समाज के रीतियों-नीतियों को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में निर्धारित करना होता है. सम्मलेन से कायस्थ समाज को दिशा एवं ताकत मिलनी चाहिए. इसे आपसी शक्ति परीक्षण का हथियार नहीं बनाना चाहिए. पिछले आयोजनों से लोगो में सम्मलेन के प्रति नकारात्मक प्रतिक्रियाएं ज्यादा आई हैं.

उपरोक्त होनेवाले तथाकथित तीनो आयोजन क्या इस परिभाषा को पुष्ट करते हैं? अगर नहीं तो कायस्थ सम्मलेन का खेल नहीं होना चाहिए. एक सामाजिक कायस्थ कार्यकर्ता होने के नाते हम इसका कडा विरोध करते हैं. आयोजक कायस्थ के नाम से खेल करना बंद करें. हाँ अगर करना हो तो प्रगतिशील बुद्धिजीवी जैसे नाम से सम्मलेन कर लें. कायस्थ समाज को कोई आपत्ति नहीं होगी और न ही कोई अपेक्षाय होगी.
- महथा ब्रज भूषण सिन्हा
, रांची, झारखंड

(उपरोक्त विचार लेखक के है और कायस्थखबर का इससे सहमत होना  अनिवार्य नहीं है )

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