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ब्रह्मा के मानस पुत्र है भगवान चित्रगुप्त

कायस्थ खबर नॉएडा I भगवान चित्रगुप्त जी ब्रह्मा के सत्रहवें और अंतिम मानस पुत्र है। ब्रह्मा ने चित्रगुप्त को भगवती की तपस्या कर आर्शीवाद पाने की सलाह दी। तपस्या पूर्ण होने पर वह देवताओं व ऋषियों के साथ आर्शीवाद देने पहुंचे, ब्रह्मा जी ने अमर होने का वरदान दिया। चित्रगुप्त का विवाह क्षत्रिय वर्ण के विश्वभान के पुत्र श्राद्ध देव मुनि की कन्या नंदिनी से हुआ। दूसरा विवाह ब्राह्मण वर्ण के कश्यप ऋषि के पोते सुषर्मा की पुत्री इरावती से हुआ। मान्यता है कि चित्रगुप्त भगवान यम राज के साथ रहकर इंसान के जीवन मरण और पाप पुण्य का लेखा जोखा रखते है यम द्वितीया पर्व पर कलम दवात की पूजा होती है। दीपावली बाद बिना कलम पूजनके कोई कायस्थ कलम का प्रयोग नहीं करता। यह कायस्थों की सबसे बड़ी पूजा होती है।

पुराणों में वर्णित है 21 सहस्द्द वर्ष की समाधि के बाद भगवान चित्रगुप्त की उत्पत्ति हुई। चित्र गुप्त को देख ब्रह्मा जी को विश्वास हुआ कि विश्व के समस्त प्राणियों के पाप पुण्य का लेखा जोखा रखने तथा उन्हे दण्डित करने के लिये उन्हे उपयुक्त संतान प्राप्त हो गया है। इस दिव्य पुरुष को चित्रगुप्त कहकर संबोधित किया, क्योंकि उनका चित्र ब्रह्मा जी के मानस में सुप्तावस्था में था। भगवान श्री चित्रगुप्त का स्वरूप कमल के समान नेत्रों पूर्ण चन्द्र के समान मुख,श्याम वर्ण, विशाल बाहु, शंख के समान ग्रीवा, शरीर पर उत्तरीय, गले में बैजयंती माला ,हाथों में शंख, पत्रिका लेखनी तथा दवात वाले एक अत्यंत भव्य महापुरुष का था। भगवान श्री चित्रगुप्त के पहले भाषा की कोई लिपि नहीं थी। उनका प्रवचन दिया जाता था श्री चित्रगुप्त ने माँ सरस्वती से विचार विमर्श के बाद लिपि का निर्माण किया और अपने पूज्य पिता के नाम पर उसका नाम ब्राह्मी लिपि रखा। इस लिपि का सर्वप्रथम उपयोग भगवान वेद व्यास के द्वारा सरस्वती नदी के तट पर उनके आश्रम में वेदों के संकलन से प्रारंभ किया गया। वेद के उप निषाद, अरण्यक ब्राह्मण ग्रंथों तथा पुराणों का संकलन कर उन्हे लिपि प्रदान किया गया। विद्वान ब्राह्मणों के मुताबिक श्री चित्रगुप्त पूजन यम द्वितीया को किया जाता है यह किसी एक जाति का पूजन नहीं बल्कि कलम से जुड़े सभी लोगों के लिये श्रेष्ठ माना गया है। यह अलग बात है कि कायस्थों की उत्पत्ति चूंकि चित्रगुप्त से हुई है अत: उनके लिये यह पूजन विशेष रूप से अनिवार्य है। यह पूजन बल, बुद्धि, साहस, शौर्य के लिये अहम माना जाता है। कई पुराणों ग्रंथों में इस पूजन के बगैर कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है।

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