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समय की मांग है २०१७ के बाद अब 2019 के लिए एक प्रभावी नीति बनाए जिससे राजनीती में और ज्यादा भागीदारिता मांगी जा सकें- रोहित श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश के चुनावों का बिगुल बज चुका है। सभी पार्टियों ने टिकटों का बंटवारा भी कर दिया है। बात चाहे भारतीय जनता पार्टी की हो या फिर सपा, बसपा और कांग्रेस की सबने कहीं न कहीं कायस्थों को टिकट दिया है। उम्मीद के मुताबिक़ न सिर्फ सबसे ज्यादा टिकट कायस्थ समाज को भारतीय जनता पार्टी ने दिए हैं बल्कि पिछले साल के मुकाबले ज्यदा दिए है ।

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब बीजेपी ने कायस्थ समाज को और पार्टियों की तुलना में ज्यादा तरजीह दी है. पहले भी भारतीय जनता पार्टी कायस्थ समाज को तरजीह देता आया है। देश में मोदी सरकार में आज बड़े-बड़े पदों पर कायस्थ समाज के लोग विराजमान हैं। बात चाहे सीबीआई की हो, सेबी की हो, कैबिनेट सचिव की हो या फिर नीति आयोग की, हर जगह कायस्थों ने शीर्ष पर जगह बनाई हुई है।
बात जब राजनीति की आती है तो वैसे तो भाजपा  ने 5 सीटें दी है फिर भी पहले की तुलना में बेहतर है। कायस्थ समाज ने हमेशा से ही बीजेपी का समर्थन किया है. इसलिए भारतीय जनता पार्टी की जिम्मेदारी/जवाबदेही कायस्थ समाज के प्रति और बढ़ जाती है. लेकिन ज्यादा सीट पाने के लिए इससे बड़ी जिम्मेदारी कायस्थ समाज की है।
सालों से एक बात कायस्थों से जुड़े हर मंच से कही जा रही है कि कायस्थों को आगे बढ़ना है तो उन्हें अपनी राजनितिक भागीदारी बढ़ानी होगी. लेकिन उस भागीदारिता को बढ़ाने के लिए उन्हें राजनीतिक पार्टीयों का साथ मिलना भी जरुरी है। बीजेपी इसमें सबसे आगे आती है। जरुरत है कि कायस्थ समाज एकजुट होकर अपने हक़ को और मजबूती से रखे।

मसलन ऐसा नहीं है कि देश में कायस्थ नेता नहीं हैं ओम माथुर, रविशंकर प्रसाद, यशवंत सिन्हा, जयंत सिन्हा, आर के सिन्हा, आलोक संजर, अरुण वर्मा और भी कई नाम हैं। लेकिन इनमें से कई नेता समाज से जुड़ने में नाकामयाब दिखते हैं या कहा जाए उनकी तरफ से कोई कोशिश तक नहीं दिखती है।

जरुरत है समाज में जिस एकता की बात हमेशा से की जाती रही है असंभव के बराबर काम को 'संभव' बनाने की। माने राजनीतिक भागीदारिता को बढ़ाने की। अपने राजनीतिक और निजी स्वार्थ को भुलाने की जो केवल समाज के विघटन का हमेशा से कारण बना है और आज भी वो बदस्तूर जारी है।

"कायस्थ खबर परिचर्चा और संवाद" की बात की जाए तो मुझे याद है वहां सभी पार्टियों के नेताओं ने अपनी कटिबद्धता को जाहिर किया था। बात चाहे कांग्रेस के प्रदीप माथुर की की जाए या फिर बीजेपी से राज्यसभा सांसद आर के सिन्हा की, सबने कायस्थ समाज को आगे बढ़ाने की बात कही। आर के सिन्हा ने अपनी बात को रखा भी। जहाँ उन्होंने संगत-पंगत आंदोलन की शुरुआत कर आज कायस्थ समाज की कई कड़ियों को एक साथ जोड़ दिया वही धीरेन्द्र श्रीवास्तव ने कायस्थ वृन्द से राजनातिक मुहीम भी चलाई जिसका फायदा इन चुनावों के साथ आने वाले समय में भी देखने को मिल भी रहा है 

समय की मांग है कि कायस्थ समाज के सभी नेता  जो आज समाज के लिए कहीं न कहीं लगे हुए हैं २०१७ के बाद अब  2019 के लिए एक प्रभावी नीति बनाए जिससे ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपना हक और भागीदारिता मांगी जा सकें।

सबक सिर्फ इतना है कि जब जागों तब सवेरा जिससे आगे न हो अँधेरा। हाँ, समय की रफ़्तार को पकड़ना आसान होता है अगर आप समय के साथ चलना शुरु कर दें। कायस्थ समाज के लिए जरुरी हो गया है कि वो अपनी पहचान और अस्तित्व को बचाने के लिए एक बार फिर से समाज के भीतर एक पुनर्विचार याचिका डालें जो समाज की बुझ गयी चेतना को जगा सकें।

रोहित श्रीवास्तव (लेखक स्वतंत्र पत्रकार है और विभिन्न संस्थानों के लिए लिखते है )

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