Templates by BIGtheme NET
Home » चौपाल » अनकही » मुद्दा : मीटिंग करना, सम्मेलन करना और चुनाव आने पर किसी न किसी पार्टी का दामन थाम कर उसका प्रचार करना, क्या हमारे संगठनों का यही जिम्मेदारी रह गई है – अतुल श्रीवास्तव

मुद्दा : मीटिंग करना, सम्मेलन करना और चुनाव आने पर किसी न किसी पार्टी का दामन थाम कर उसका प्रचार करना, क्या हमारे संगठनों का यही जिम्मेदारी रह गई है – अतुल श्रीवास्तव

अक्‍सर राजनीतिक दलों की निगाहें कहीं औरहोती है और निशाना कहीँ और होता है।लेकिन जब सामाजिक विकास के नाम पर बनी संस्‍थाओं का चालचलन और नीतियॉं भी राजनीतिक पार्टियों के खिलाडियों जैसी हो जायें तो इन संस्‍थाओं के चेहरे और चेहरे के पीछे के भावों पर शक की सुईयॉं घुम ही जातीहै।
पूरे देश में कायस्थ के एक, दो, नहीं बल्कि हजारों कायस्थ संगठन हैं। इनमें से कुछ कायस्थ संगठन देश स्तर पर तो कुछ अपने-अपने प्रदेश में काम कर रहे हैं। शुरूआती दौर में तो इन संगठनों के कार्य बहुत अच्छे लगते हैं, पर दिन बीतने के साथ ही उनकी कार्य प्रणाली मे बदलाव आ जाता है। इन बदलावों में कुछ ऐसी वात होती है कि संगठन के कई- सदस्य नाराज होकर संगठन का साथ छोड़ देते हैं और इसी नाराजगी के बाद पड़ती है एक नये संगठन की नींव। कायस्थ संगठनों की बढ़ती संख्या की वजह नाराजगी है। सभी को साथ लेकर काम करने वाले संगठन नाम मात्र के रह गये हैं। कायस्थ संगठनों पर राजनैतिक रंग चढ़ने लगा है। लोगों को लगता है कि संगठन बनाकर हजार पाँच सौ की भीड़ इकट्ठा कर एक सम्मेलन कर लेने से कोई न कोई बड़ा राजनीतिक दल प्रभावित हो जायेगा और उनको टिकट दे देगा। इसकी वजह से रोज नये संगठन खड़े हो रहे हैं और वह किसी न किसी राजनीतिक दल का गुणगान कर रहे हैं। समाज की समस्याओं से किसी का कोई सरोकार नहीं रह गया है। सभी अपना स्वार्थ साधने में लगे हैं। संगठन के मुख्य कर्ता-धर्ता की निगाह अपने संगठन के भरोसे विधानसभा और लोकसभा पर लगी है। मैं यह नहीं कहता कि हमारी निगाह लोकसभा और विधानसभा पर नहीं होना चाहिये, बेशक हमें अपने लोगों को लोकसभा और विधानसभा में पहुंचाना है परन्तु लोगों का यह तरीका ठीक नहीं है। सर्वप्रथम सामाजिक संगठनों का गठन जिस उद्देश्य से किया गया है उसकी भी पूर्ति होनी चाहिये।
यहां पर मैंने जो वात उठाई है वह संगठनों के क्रियाकलापों से सम्बद्ध है। मीटिंग करना, सम्मेलन करना और चुनाव आने पर किसी न किसी पार्टी का दामन थाम कर उसका प्रचार करना, क्या हमारे संगठनों का यही जिम्मेदारी रह गई है? हमारे संगठन सामाजिक मुद्दों के प्रति कितना सचेत हैं, समाज में उनकी क्या सहभागिता है, वह समाज के लोगों की व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने में क्या भूमिका निभाते हैं, शायद इन सभी सवालों का जवाब शून्य है। स्थानीय स्तर पर कार्य करने वाले संगठनों को छोड़ दिया जाय तो देखने को मिलता है कि देश स्तर पर काम करने वाला कोई भी संगठन सामाजिक कार्य नहीं कर रहे है। यदि उनके द्वारा कोई सामाजिक कार्य हो भी रहा है तो वह स्थानीय ही है, सिर्फ बैनर देश स्तरीय संगठन का लगा होता है।
मैं सभी संगठन के प्रमुखों से यह कहना चाहूंगा कि वह अपनेसंगठनकीगतिविधियों में सामाजिक कार्यों को महत्व दीजिये। समाज के लोगों की व्यक्तिगत समस्याओं के निराकरण का भी प्रयास करे अन्यथा समाज के लोगों का विश्वास संगठन से उठ जायेगा और इस स्थिति में बैनर के अलावा कोई भी साथ देने वाला नहीं मिलेगा।
अक्सर देखा जाता है कि सभी संगठन समाज के लोगों को बैठक और सम्मेलन में तो बुलाते हैं पर कभी उनके सुःख-दुःख में भाग नहीँ लेते हैं। इन्हीं कारणों से संगठनों की लोक प्रियता भी घट रहीहै।यदिसंगठनों को अपना अस्तित्व बचाना है तो उन्हें ताल मेल बैठाकर कार्य करना होगा और लोगों में विश्वास पैदा करना होगा।
स्वार्थ की भावना का परित्याग करना होगा।
"सोच बदले समाज बदलेगा "
अतुल श्रीवास्तव
जय श्री चित्रगुप्त
जय कायस्थ

आप की राय

comments

About कायस्थ खबर

कायस्थ खबर(http://kayasthakhabar.com) एक प्रयास है कायस्थ समाज की सभी छोटी से छोटी उपलब्धियो , परेशानिओ को एक मंच देने का ताकि सभी लोग इनसे परिचित हो सके I इसमें आप सभी हमारे साथ जुड़ सकते है , अपनी रचनाये , खबरे , कहानियां , इतिहास से जुडी बातें हमे हमारे मेल ID kayasthakhabar@gmail.com पर भेज सकते है या फिर हमे 8826511334 पर काल कर सकते है आशु भटनागर सम्पादक कायस्थ खबर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*