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कायस्थ समाज का दुर्भाग्य ये है की सब अपनी अपनी ढपली बजाने में और अपना अपना राग अलापने में लगे हैं – अतुल श्रीवास्तव

हमारे कायस्थ समाज का दुर्भाग्य है कि जो हमारे नेता होने का दम भरते हैं वे ना तो समस्याओं की पहचान करना चाहते हैं और ना उन समस्याओं का निदान चाहते हैं | क्या उन लोगों में सामाजिक जिम्मेदारी की भावना काअभाव है या लोग बेवजह के झंझटों में पड़ना नहीं चाहते? जिस समाज में बड़े बड़े व्यापारी, उद्योगपति, नौकरीपेशा और शिक्षित लोग हो उस समाज को अपनी सामाजिक पहचान की दरकार है ।हमें यह सोचना होगा कि हम कैसा समाज चाहते है |व्यक्तिगत रूप से समाज के लोग सम्पन्न और सक्षम लोगों की श्रेणी में आते हैं किन्तु ये भी सत्य है कि स्थिति ज्यादा बेहतर नहीं है ।

किसी भी समाज की पहचान इन बातों से होती है

  1. समाज की शिक्षण संस्थाएं,
  2. समाज की स्वास्थ्य सेवा संस्थाएं
  3. समाज की व्यावसायिक/आर्थिक सहायता संस्थाएं
  4. समाज सम्मेलन में समाज के लोगों की भूमिका
  5. समाज के इष्ट देवता के मन्दिर इत्यादि 

बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात हैकि आज अपने समाज की पहचान के लिए हमारे पास कुछभी नहीं है ! जहाँ आज अन्य समाज अपने लोगों की सुविधाएं जुटाने में लगे रहते हैं और सफल होते जा रहे हैं ।किन्तु हमारे समाज की यह स्थिति सुधरती क्यूँ नहीं? अगर आप समाज के बारे में सोचें तो बहुत से प्रश्न आपके सामने उठ खड़े होगे।लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कि हम समाज के रूप में असफल क्यूँ हैं? समाज एक व्यक्ति नहीं है अगर समाज की पहचान नहीं बन पाई या समाज की प्रगति नहीं हुई तो यह पूरे समाज की असफलता है, यह हमारे बड़े बुजुर्गों की असफलता है की वे नई पीढ़ी के लिए आदर्श स्थापित नहीं कर पाए, कोई मार्ग नहीं दिखा पाए और यह वर्तमान पीढ़ी की भी असफलता है की हम भावी पीढ़ी के लिए कोई आदर्श स्थापित करने के प्रति चिंतित नहीं हैं |

हमें यह सोचना ही होगा कि अगर समाज के किसी व्यक्ति को किसी प्रकार की प्रतिकूल स्थिति का सामना करना पड़े तो वह समाज में किसका सहारा ढूढेगा ? समाज के बच्चों को अगर अपनी शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता पड़ जाये तो वह सहायता के लिए किस से उम्मीद लगाये? अगर घर का मुखिया पर कोई कठिनाई आ पड़े तो वह सहायता के लिए किसे पुकारे? समाज से उसे बच्चों की शिक्षा के लिए, बीमारी में दवाई के लिए, परिवार में शादी ब्याह होने पर यदि उसे किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो तो वह किसका मुह देखे ?

यह हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक असफलता है | यह समाज के उन जिम्मेदार लोगों की असफलता है जो वर्षों से समाज के ठेकेदार बन के तो रहे किन्तु समाज के लोगों की सुध लेने की जिन्हें कभी फुर्सत नहीं मिली, अपने पदों पर बने रहने के लिए जमीन आसमान एक कर देने वाले जिम्मेदार लोगोंकीअसफलता है ।सब अपनी अपनी ढपली बजाने में और अपना अपना राग अलापने में लगे हैं । तो इन समस्याओं केनिराकरण की उम्मीद कैसे करोगे जिम्मेदार लोगों के पास कोई विचार ही नहीं है | हमारी सामाजिक चर्चाओं का विषय कभी यह नहीं रहा की किस तरह समाज के बच्चों को अन्य समाज के बच्चों के सामान प्रतियोगी माहोल दिया जाये जिससे वे रोजगार के नए क्षेत्रों की और अग्रसर हो सकें |

कायस्थ समाज की वर्तमान सामाजिक स्थिति के लिए सम्पूर्ण कायस्थ समाज की बराबर की जिम्मेदारी बनती है | प्रत्येक व्यक्ति को यह सोचना होगा । समाज के प्रत्येक नागरिक को समाज के प्रति अपने पूर्वाग्रहों, व्यक्तिगत रागद्वेष को त्यागकर समाज के उत्थान के लिए थोडा वक्त देना होगा | जो लोग समाज के सम्मानित पदों पर हैं उन्हें सोचना होगा की समाज उनसे उम्मीद करता है की वे समाज को आगे ले जाने केलिए कार्य करेंगे | ताकि हम भी अन्य समाज की तरह विकसित और संपन्न समाज का हिस्सा बन सकें |
"सोच बदले समाज बदलेगा "
जयश्रीचित्रगुप्त
जय कायस्थ
अतुल श्रीवास्तव

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One comment

  1. मन मोहन सहाय

    हर समाज अपना धर्मशाला, अपने लोगों की डाइरेक्टरी, अपने लोगों के लिये मेडिकल कैम्प इत्यादि करता रहता है। दुर्भाग्य से हमलोगों का ऐसा कोई प्रोग्राम ही नहीं बन पाता। मनमोहन सहाय

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