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संगठन, संगठन और संगठनों का खेल -सूत न कपास दो जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा? महथा ब्रज भूषण सिन्हा

जय कायस्थ समाज की. आपकी प्रशंसा के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं, शब्द है भी तो लेखनी में स्याही अल्प है मुख से बखान करूँ तो सिर्फ एक ही मुख है. हे मेरे कुल पुरुष भगवान श्री चित्रगुप्त, मेरी जिह्वा पर सरस्वती विराजमान हों, सहस्त्र मुख हों तथा लेखनी में स्याही का समुद्र भर दें, ताकि मैं अपने मुख से, लेखनी से अपने बारह पूर्वजों से उपजे पुत्रों के ज्ञान, कर्म व पराक्रम का बखान कर सकूँ. हे मेरे अराध्य, वर दें वर दें वर दें.

हे प्रभु, मेरी नींद उड़ गई है, जब से दो योद्धा का युद्ध आकाश व धरती के बीच लडे जाते हुए देख रहा हूँ. दोनों योद्धा के पाँव तले जमीं नहीं है. अतः पांव तले जमीन खिसकने का मुहावरा भी व्यर्थ है. समय बलवान है, सुना था, पर दोनों के पराक्रम से तो ऐसा नहीं लगता कि उनसे भी बलवान कोई हो सकता है.

तथास्तु, कायस्थ समाज की उर्वर भूमि में ऐसे कई सुपुत्र / सुपुत्री पैदा होते रहे हैं जो किसी न किसी बहाने नाम करते रहते हैं. सूत न कपास दो जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा? एक समय था जब कायस्थ समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष कहलाने का गौरव ही कुछ अलग था. एक सज्जन ने इस गौरव को जाम समझ कर पूरा का पूरा पी डाला और बेसुध पड़े हैं किसी कोने में. अब कुछ उनके अनुयायी या कहिये उनके गुरुकुल से शिक्षित लोग खाली गिलास चाट-चाट कर ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के गौरव को ढूंढ रहे हैं और विक्षिप्त हो रहे हैं. न जाने कितने संगठन इस तलाश में बन चुके.

अब इक्कीसवीं सदी के दौर में या कहिए विकास के दौर में नया संगठन का क्रेज भी फीका पड़ चूका है. अब है संगठनों का संगठन बनाने का great आईडिया. मतलब संगठनो की अट्टालिका? इस पर मालिकाना हक हासिल करने हेतु, हो सकता है परमाणु युद्ध छिड़ जाए? और यह होगा भी तो व्हाट्स एप्प पर ! अभी तो कायस्थ पोर्टल की सनसनी चल रही है. एक तरफ देवी तो दूसरी ओर देव?

दूसरी ओर एक अलग ही कथा चल रही है. प्रभु श्री चित्रगुप्त के प्रगटोत्सव मनाने की. सबके दावे हैं कि उन्ही की प्रेरणा से देश-विदेश सभी जगह प्रगटोत्सव मनाई जा रही है. लिस्ट लम्बी होती जा रही है. सोचा पढ़ ही डालूं. पर मैं पढ़ने में हमेशा फिसड्डी रहा. कुछ विदेशों के भ्रमण कर ही रहा था कि नींद आ गई. जब नींद खुली तो मेसेज ही गायब पाया. मै समझ गया कि यह काम हमारे बगल में बैठे हमारे शुभ चिन्तक के सिवा कोई दूसरा कर ही नहीं सकता. पूछने के पहले ही उन्होंने बता दिया कि एक मेसेज पढ़ने में नींद आ गई अभी तो कई लोगों की लम्बी लिस्ट पढ़नी बाकी थी, तब क्या होता? मैंने सभी को डिलीट कर दिया. “जान बचे तो लाखों पायें” दोस्त हैं, कुछ बोल नहीं सकता न.

व्हाट्स एप्प के निर्माता जान कौम एवं ब्रायन एक्शन ने सोशल मीडिया को एक ऐसा उपहार दे डाला है कि मत पूछो? कहीं वे भी कायस्थ तो नहीं? या पूर्व जन्म में जरुर कायस्थ रहे होंगे, है न?
घर बैठे राष्ट्रीय अध्यक्ष, समन्वयक, न जाने कितने तरह के पदाधिकारी बनने-बनाने का सुख प्राप्त कर लो. ग्रुप बनाओ, ग्रुप में जोड़ो फिर ग्रुप में झगड़े-टंटे करो, ग्रुप से बाहर करो. कोई किसी का चेहरा तक नहीं देखा और सब कुछ हो गया. आया न मजा. कोई इलाहबाद बैठा तो कोई गोरखपुर तो कोई गाजिआबाद. मेल भी हो गई, बाते भी हो गई, झगड़े भी हो गये. और इन-आउट भी.

जय हो संगठन महाराजाधिराज की.

-महथा ब्रज भूषण सिन्हा.

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