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Home » चौपाल » अनकही » रविवार विशेष : हम मदारी हैं??? अच्छा अच्छा चल रे मुन्नू नाच तो जरा….. हाँ ऐसे ही…. शाबाश… हाँ लगा ठुमका-कवि स्वप्निल

रविवार विशेष : हम मदारी हैं??? अच्छा अच्छा चल रे मुन्नू नाच तो जरा….. हाँ ऐसे ही…. शाबाश… हाँ लगा ठुमका-कवि स्वप्निल

साहेबान,कद्रदान, भाई जान

आईये खेल दिखाता हूँ,
आईये हजरात आईये गुदगुदाता हूँ, हँसाता हूँ। आईये आईये घेरा बनाइये और देखिये इस मदारी का कमाल। कैसे नाचेगा बन्दर, कैसे करतब दिखायेगा भालू,कैसे बिल्ली खम्भा नोचेगी, सब दिखाऊंगा।

हाँ जी साहब! क्या बन्दर का नाच???
अच्छा अच्छा चल रे मुन्नू नाच तो जरा..... हाँ ऐसे ही.... शाबाश... हाँ लगा ठुमका....

लाओ जी साहब जी मुन्नू अब केला खायेगा 10 रूपये दे दो।
हाँ ले मुन्नू पैसे ले और साहब को सलाम थोक।

बीते कुछ दिनों से यही कर रहा हूँ। सच, मदारी हो चला हूँ।
पर अलग किस्म का मदारी हूँ जहाँ मदारी भी मैं और बन्दर भी मै,पर ना मेरे हाँथ में डण्डा है और ना ही बन्दर की रस्सी।

अब मदारी का खेल समझ भी आने लगा है। अब रस्सी छिनने की बजाय कुतरना सीख चूका हूँ। अब आजाद होना सीख चूका हूँ।
पर मेरे समाज के युवा साथियों आह्वान आप सब से है, उठीये, जागिये, अब कुर्सी लगाना, माला पहनाना, मंच सजाना बन्द कीजिये। मदारी बनाना और मदारी बनना बन्द कीजिये।

आपके गर्दन में पड़ी रस्सी को पहचानकर उसे कुतर दीजिये, तोड़ दीजिये,काट दीजिये ,आजाद हो जाइये और फिर आगे आईये मंच सजाइये, मंच बनाइये और फिर उसी मंच से आपके गर्दन की टूटी रस्सी पकड़े हुए लोगों के लिए चिल्लाईये "भीड़ बनाइये,भीड़ बन जाईये, भेड़ बनाइये,भेड़ बन जाईये।"

-कवि स्वप्निल

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