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कायस्थखबर लाया है आपके व्यक्तिगत/व्यवसायिक पहचान को समाज तक पहुंचा कर सामूहिक लाभ में बदलने की योजना http://kayasthakhabar.com/?p=9033 जानिये कैसे आप अपने व्यवसाय की पहचान कायस्थ समाज के सभी लोगो तक पहुंचा कर लाभ कमा सकते है

बूंद-बूंद इकट्ठे कर तालाब और सागर बनते हैं। हम सब भी इकट्ठे होकर बहुत कुछ कर सकते हैं -महथा ब्रज भूषण सिन्हा

वह बहुप्रतीक्षित दिन आ गया……………….
कायस्थ समाज मे आज एक बहुत बड़ी घटना हुई। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा मे गुट का अंत तो नहीं हुआ है, पर पक्ष शब्द मिट गया। हम आशान्वित हैं कि वह दिन भी दूर नहीं जब गुट का भी नामोनिशान नहीं होगा। इस अवसर पर हमारे कुछ भाई के नेत्र सजल हो उठे तो किसी की भृकुटियाँ भी तनती दिखी। कुछ पद के अधिकारी भी चिंतित दिख रहें हैं कि अब क्या होगा ? एक अव्यक्त सा सन्नाटा दिख रहा है, तथाकथित पदाधिकारियों की दुनिया मे। ऐसा लग रहा है, जैसे बिहार मे शराबबंदी का पहला दिन हो।

वर्षों से विसंगतियाँ झेल रहे हमारे समाज मे ऐसी स्थिति, परिस्थितिजन्य ही था। हर जिले, प्रदेश एवं राष्ट्रीए स्तर पर अध्यक्षों की असीमित संख्या मे लोगों के पहचान सुनिश्चित करने के लिए गुट या पक्ष बताना पड़ता था। पर क्या यह इस घटना से समाप्त हो जाने वाली है? नहीं, ऐसा होने वाला नहीं है, पर तीहरी कतार जरूर खत्म हो जायगी। इसलिए इस संधि का हमारे समाज मे खुशी से स्वागत होना चाहिए।

आज से अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप मे श्री ए॰के॰ श्रीवास्तव जी के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी शुरू हो चुकी है। इन्हे एक साथ आर्ट्स, कॉमर्स एवं साईंस के सभी विषयों की परीक्षा पास करनी होगी। मुझे भरोसा है कि इन्हे पी॰एच॰ डी॰ धारी डॉ शरद सक्सेना जी मार्ग से विचलित नहीं होने देंगे और सारी परीक्षाएँ सफलता पूर्वक सम्पन्न कराते जाएँगे ।

समाज मे वर्षों से लंबित कई कठिनाईयां है, जिसका गहन अध्ययन और समाधान की दिशा मे कार्य को पहली प्राथमिकता देने की जरूरत होगी। हमारी अगली पीढ़ी यानि युवा वर्ग काफी दिग्भ्रमित है, जिसे संभालना आवश्यक है। समाज सेवा को नए सिरे से परिभाषित करना, एकता की राग गा रहे बेसुरे आवाजों को सुर-ताल मे लाना, एवं सामाजिक भावना के प्रवाह को सही दिशा देते हुये तेज करने की महती जिम्मेवारी को रेखांकित करना होगा। समाज मे राजनीति नहीं, राजनीति मे समाज को लाना होगा।

हमारे समाज मे एक बीमारी ने जड़ जमा ली है और वह है निष्क्रियता, शिथिलता । लोग घरों से निकले बिना अपने समस्याओं के समाधान पा लेने की सोच से परिपूर्ण हो गए हैं, जिसे परित्याग करना होगा। प्रकृति का नियम है “थोड़ा दो और अधिकतम लो” बिना बीज डाले फसलों से गोदाम नहीं भरते। बूंद-बूंद इकट्ठे कर तालाब और सागर बनते हैं। हम सब भी इकट्ठे होकर बहुत कुछ कर सकते हैं। अतः हमे सबल समाज बनाने के लिए नेतृत्व को हर स्तर पर सहयोग करना होगा, तभी हम कायस्थ समाज को प्रगति के पथ पर दौड़ने लायक बना सकते हैं।
अंत मे असीम शुभकामनाओं के साथ …….
-महथा ब्रज भूषण सिन्हा।

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