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“कायस्थ समुदाय समझ न सका लोकतंत्र में विद्वता से अधिक महत्वपूर्ण है वोट की ताकत” बिहार में एक बार फिर से मात खाने पर एक रिपोर्ट

कायस्थ समाज एक बार फिर से चर्चा में है, बिहार में जद यु और बीजेपी की संयुक्त सरकार में कायस्थ समाज से एक भी मंत्री नहीं बनाया गया है , ऐसे में बिहार में कायस्थ समाज में हताशा चरम पर है, आर के सिन्हा समेत कई नेता बीजेपी से ही नाराजगी प्रकट कर रहे है I लेकिन कायस्थों को एक बात दुबारा समझनी होगी की लोकतंत्र में विद्वता से अधिक महत्वपूर्ण है वोट की ताकत, इसी पर एक लेख काफी समय पहले जुगनू शारदेय जी  ने लिखा था , कायस्थ खबर उसको एक बारफिर से प्रकाशित कर रहा है I लेख से सम्बंधित कापीराईट लेखक के है कायस्थ खबर उसे सोशल मीडिया से लेकर प्रकाशित कर रहा I किसी भी तरह के कापीराईट विवाद में इसे हटाया जा सकता है

 

यह सत्य है कि बिहार प्रांत के गठन में सच्चिदानंद सिन्हा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वे जब इंगलैंड में अपनी वकालत की पढ़ाई कर रहे थे तो अनेक लोगों ने उनसे कहा कि बिहार नाम का कोई प्रांत इंडिया में नहीं है।

यह बात उन्हें बहुत बुरी लगी। इंगलैंड से वापस आ कर उन्होंने आंदोलन छेड़ा कि बिहार अलग प्रांत बने। और लोगों ने भी उनकी मदद की।
उस समय बिहार का मतलब आज का गया जिला होता था।
यह केवल संयोग ही है कि सूबा बिहार को बंगाल से जोड़ दिया गया था। मुगल काल के बाद जब इंगलिशिया राजपाट बना तो आज का बिहार या पटना बंगाल के साथ ही था।

तब बिहार का प्रशासन सदी 1700 के आस पास सिताब राय इंगलिशिया राजपाट की तरफ से देखते थे। सिताब राय भी कायस्थ थे और सच्चिदानंद सिन्हा भी कायस्थ थे। हिंदुस्तान के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी कायस्थ थे। सच तो यह भी है कि संविधान सभा के वह पहले अध्यक्ष थे, तब उन्हें अंतरिम अध्यक्ष भी माना गया। 1950 में उनकी मृत्यु के बाद बिहार के राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया। वह भारत के लोकतंत्र बनने के पहले ही राष्ट्रपति चुन लिए गए 26 जनवरी 1950 को और एकमात्र राष्ट्रपति हैं जिनका कार्यकाल 14 मई 1962 तक रहा यानी दो बार या तीन बार। वह भी कायस्थ थे।
जयप्रकाश नारायण भी कायस्थ थे। ऐसी स्थिति में बिहार के कायस्थों के मन में राजपाट की ललक कोई चौंकाने वाली बात भी नहीं है। हालांकि जयप्रकाश नारायण राजपाट से दूर रहे।

पढ़ाई – लिखाई में आगे रहने के बावजूद कायस्थ समुदाय यह नहीं समझ पाया कि लोकतंत्र में विद्वता से अधिक महत्वपूर्ण है वोट की ताकत।
इंगलिशिया सरकार ने कायस्थों को बहुत अधिक महत्व नहीं दिया। कायस्थ भी वकील बनने में ही अपना लक्ष्य मानते थे। वोट की ताकत को उन्होंने महत्व नहीं दिया। देते भी क्यों 1952 के विधान सभा के चुनाव में उनकी सदस्य संख्या 40 थी। यह लगातार घटती गई। 2010 के विधान सभा चुनाव में घट कर 4 हो गई। यह मात्र संयोग नहीं है कि सभी के सभी भाजपा से जुड़े हुए हैं। निर्दलीय दिलीप वर्मा को भी भाजपा का समर्थन प्राप्त है।

यह भी मात्र संयोग नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी ने कायस्थों के महत्व को समझा। वोट की राजनीति में संख्या बल में कम होने के बावजूद शिक्षित वर्ग में कायस्थों का अपना महत्व रहा है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में कायस्थ शामिल हो रहे थे। उनके मन में यह हीन भाव था कि बुद्धिबल में तेज होने के बावजूद वोटबल में कमजोर होने के कारण वोटबल में प्रभावशाली लोग उन्हें सत्ता की राजनीति में आगे बढ़ने से रोकते रहे हैं। वोटबल में उनका पहला मुकाबला सवर्ण समुदाय की अन्य समुदायों से ही हुआ।

बिहार में कायस्थ सवर्ण समुदाय में माने जाते हैं। मंडल आयोग के बाद जिस नौकरियों पर उनका अधिकार था, वह भी छिनने लगा। यह भी उनकी गलतफहमी ही थी।
तथ्य यह था कि सवर्ण समुदाय के अन्य वर्गों ने ही उन्हें पीछे धकेल दिया था। वह अपनी बौद्धिक क्षमता के बल पर सवर्णों के अन्य समुदाय का मुकाबला नहीं कर सकते थे। फिर भी कृष्णवल्लभ सहाय ने अपनी चतुराई से 1963 में मुख्यमंत्री पद हासिल कर लिया था – उसे हासिल करने में उन्हें सवर्ण समुदाय के राजपूतों की मदद मिली।

उस वक्त कांग्रेस विधायक दल में उनका सामना पिछड़े नेता बीरचंद पटेल ( कुरमी ) से था।
मुख्यमंत्री बनने के बाद कृष्णवल्लभ सहाय ने पिछड़े समुदाय के संख्या बल में अधिक यादव समुदाय के रामलखन सिंह यादव को आगे बढ़ाया। संयोग से उसी काल 1965- 66 में बिहार में भयंकर अकाल पड़ा था। उस अकाल का सामना सहाय ने किया। जयप्रकाश नारायण ने उनकी राहत कार्य की सराहना की तो लोगों ने यह कहा कि एक कायस्थ, दूसरे कायस्थ की तारीफ कर रहा है।

पर सच है कि वह तब तक बिहार के सबसे अच्छे प्रशासनिक मुख्यमंत्री थे। लेकिन उसी काल में राममनोहर लोहिया का गैरकांग्रेसवाद बिहार में तेजी पर था और 1967 के चुनाव में उनकी हार हो गई। बिहार के संयुक्त विधायक दल ने भी बिहार की सवर्ण वाद की नीति के कारण महामाया प्रसाद सिन्हा को अपना नेता चुना और वह मुख्यमंत्री बने। यह कायस्थों का आखिरी बड़ा ओहदा था।
महामाया मंत्रीमंडल में उद्योग विभाग के मंत्री ठाकुर प्रसाद थे। आज उनके पुत्र रविशंकर प्रसाद नरेंद्र मोदी मंत्रीमंडल के महत्वपूर्ण मंत्री हैं और उनकी बेटी अनुराधा प्रसाद एक न्यूज चैनल की मालकिन हैं।

यशवंत सिन्हा इसी काल में ( 1977 ) में मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का प्रधान सचिव थे। बाद में वह चंद्रशेखर के करीबी हो गए और जनता पार्टी के रास्ते भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने एक वक्त में उन्हें बिहार में नेता, प्रतिपक्ष भी बनाया था। अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रीमंडल में वह भी महत्वपूर्ण मंत्री रहे और आज उनके पुत्र जयंत सिन्हा भी वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।
और तो और शत्रुघ्न सिंन्हा एक वक्त में बिहार के इकलौते फिल्म स्टार थे। एक और पत्रकार से अरबपति बने रवीन्द्र किशोर सिन्हा ने बिहार में सुऱक्षा एजेंसी की शुरुआत की। अभी राज्य सभा सदस्य हैं।

ऐसी हालत में बिहार के सभी दल कायस्थों का वोट पाने के लिए कायस्थों का तरह-तरह का सम्मेलन कर रहे हैं। पर सच यह है कि कायस्थ समुदाय अनेक कारणों से भाजपा का वोटर है। जदयू ने पवन वर्मा को राज्य सभा का सदस्य बना कर कायस्थों में पैठ बनाने की कोशिश की, पर बिहार के कायस्थ उन्हें बाहरी ( उत्तर प्रदेश ) का मानते हैं। बिहार के कायस्थ शंभू शरण श्रीवास्तव ने जदयू छोड़ दिया है। जदयू के पास उनके जैसा कोई प्रवक्ता फिर नहीं हुआ।

अब बिहार के कायस्थ राजपाट में अपना हक मांग रहे हैं। सच इतना है कि वह खुद नहीं जीत सकते हैं – एकाध जगहों को छोड़ कर। पर लगभग दो दर्जन क्षेत्रों उनके बल पर किसी भी दल का उम्मीदवार जीत सकता है।

जुगनू शारदेय
(जुगनू शारदेय लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. फिलहाल सलाहकार संपादक ( हिंदी ) – दानिश बुक्स, )

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