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Home » चौपाल » मुद्दा : हर मंत्रीमंडल विस्तार के बाद कायस्थों की उपेक्षा पर दुसरो को कोसने की जगह राजनैतिक दावेदारी मजबूत करना ज़रूरी है
विज्ञापन कायस्थ खबर परिचर्चा एवं संवाद २०१७ , भाग लेने के लिए अपनी डिटेल भेजे

मुद्दा : हर मंत्रीमंडल विस्तार के बाद कायस्थों की उपेक्षा पर दुसरो को कोसने की जगह राजनैतिक दावेदारी मजबूत करना ज़रूरी है

सम्पादकीय I केन्द्रीय मंत्रीमंडल में विस्तार के साथ ही आज एक बार फिर से सोशल मीडिया कायस्थ समाज के स्वयंभू नेताओं और चाटुकारों का रुदन चालु हो गया I सभी एक सुर में कायस्थों को जगह ना देने की बात पर व्हाट्स अप्प ग्रुपों पर शोर मचाये है I व्हाट्स अप्प ग्रुपों और फेसबुक पर लोगो के आक्रोश को देख कर लगता है जैसे कायस्थ समाज की जबरदस्त उपेक्षा राजनीति में हो रही है I लेकिन क्या कभी कायस्थ समाज के अह्मारे तथाकथित नेताओं और उनके समर्थको ने सोचा है की आखिर ये स्थिति क्यूँ है ?

  • क्या सच में कायस्थ समाज ने इतने नेता दिए हैं जिसमे से किसी एक को मंत्रिमंडल में लेकर संतुलन बनाए जा सके ?
  • क्या कायस्थ समाज के नेता वाकई सरकारों में पार्टियों में इतना दम रखते है की सरकारे मंत्रिमंडल में मंत्री चुनते हुए उनको सोच सके ?
  • क्या कायस्थ समाज के नेता सच में इतना बड़ा सामुदायिक प्रभाव साबित कर पाते है की सरकारे उनको जगह दे सके ?
  • आपको ऐसे कितने नेता याद है जो बीते समय में लाखो वोट से जीत जाते हो, या उनके समर्थन में किसी रैली में हजारो की भीड़ आती हो ?

इतने सारे सवालों के जबाब अगर आपके पास नहीं  में हैं तो आप कैसे सरकारों  से सवाल कर सकते है या कैसे उनसे शिकायत कर सकते है कि उन्होंने आपको नहीं चुना I दरअसल सरकारों और राजनातिक दलों की चयन प्रक्रिया पर बात करते हुए ऐसे ही एक सवाल के जबाब में पिछले साल कायस्थ खबर परिचर्चा एवं संवाद में जनता दल यु के प्रवक्ता डा अजय आलोक ने इस बात को बेबाकी से स्वीकार किया था I उन्होंने माना था की कायस्थ नेता कायस्थ समाज से सीधे संवाद करने में सफल नहीं हो पाते है , जातीय प्रखरता के दौर में भी अधिकाँश कायस्थ नेता पार्टी लाईनके खिलाफ जाने से बचते है I पार्टी में अपना जनता के साथ सीधा सम्पर्क ना दिखा पाने के चलते ही कायस्थ नेता हमेशा हाशिये पर रहते है I

आखिर क्या है समाधान ?

सोशल क्रांति के दौर में ये तो सही है की आज कायस्थ समाज के नेता भी सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनाने में सफल हो रहे है I लेकिन अभी उनके ज़मीनी संपर्क सतही साबित हो रहे है I राजनैतिक लाबिंग के दौर में अक्सर कायस्थ नेता कमज़ोर साबित हो जाते है I ऐसे कायस्थ समाज के उभरते हुए नेताओं को लाबिंग और प्रचार दोनों ही माध्यमो पर ध्यान देने की आव्श्यकता है I एक बड़े नेता ने राजनीती में दिखाई देते रहने की कला को महत्वपूर्ण बताया था उन्होंने कहा था की राजनीती समाज सेवा से नहीं पार्टी में अपनी शकल दिखाने से होती है I राजनैतिक तोर पर जब तक पार्टी को अपनी उपस्थिति नहीं साबित कर पायेंगे तब तक ऐसे ही चयन की दौड़ में पिछड़े रहेंगे I

राजनीती में ज़मीनी प्रभाव सीधे नहीं साबित होता , देखा जाए तो आज समाज को विधयाक , सांसद से पहले , प्रधान , पार्षद और  चेयरमैन वाली राजनीती में मजबूत होना पड़ेगा I और कायस्थ समाज के युवाओं को इस बात को सही तरीके से समझना पड़ेगा की जब तक सामाज के नेताओ की एक बड़ी संख्या इन पदों पर नहीं होगी तब तक विधायक, सांसद की राजनीती भी मजबूत नहीं होगी I राजनातिक पिरामिड को सफल बनाने का काम करने के लिए हमें राजनीती के आधार पर ध्यान देना होगा

सामाजिक संगठन के संयोजक के नाम पर टिकट दिलाने वाले स्वयंभू नेताओं और स्वयंभू नेत्रियो से भी कायस्थ समाज के नेताओं को दूर रहना होगा I यूपी चुनाव में भी ऐसे ही एक संयोजक की भूमिका पर काफी सवाल उठे थे, बड़े नेता के नाम पर २०१७ में ऐसे लोगो ने बहुत लोगो को अंतिम समय तक बेब्खुफ़ बनाया था I ऐसे लोग फिर से आधार हीन संस्थाओं के नाम पर अपनी गोटी बैठाने के खेल में लग गये है, अगर कायस्थ नेता अब भी इन्ही के जाल में फंसे रहे तो एक बार फिर से सभी राजनैतिक दलों से टिकट मिलने में निराशा ही हाथ लगेगी I

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One comment

  1. अनिल श्रीवास्तव

    सटीक और सामयिक विश्लेषण

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