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कायस्थों के सभी संगठन के पदाधिकारी पद लोलुपता एवम अहम् के शिकार हैं -महथा ब्रज भूषण सिन्हा

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा प्रदेश अघ्यक्ष : महथा ब्रज भूषण सिन्हा प्रदेश कार्यालय: किशोरगंज, रोड न. 6, हरमू रोड, रांची. 9431176739/9934582611

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा में मै पिछले सात वर्षों से कार्य कर रहा हूँ. इस अवधि में मैंने पाया है कि कायस्थों के सभी संगठन के पदाधिकारी समाज सेवा के नाम पर पद लोलुपता एवं अपने को बड़े साबित करने के अहम् के शिकार हैं. परिणाम स्वरूप आम कायस्थों का भरोसा सभी कायस्थ संगठनो से प्रायः उठ चूका है.

कायस्थों के जितने संगठन हैं शायद ही दुसरे जातियों में मिलेंगी. इसका सिर्फ एक ही कारण है और वह है कायस्थों की अहं, जो किसी का नेतृत्व स्वीकार करने केलिए तैयार नहीं. सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है की सभी कायस्थ संगठन कायस्थों में एकता, उनका विकास और उन्हें सहायता प्रदान करने की बात करते नहीं थकते. दुनिया का हर समाज स्वार्थी होता है. वह आपसे अनगिनत अपेक्षाए रखता है पर बदले में देने के लिए अनगिनत आरोप एवं लांछन होते हैं. उनके पास कुछ ही शब्द प्यार और प्रशंसा के होते हैं, जो बड़ी कठिनाई से ही किसी संगठन को प्राप्त होती है. सच-मुच प्रशंसा के वे शब्द बहुत ही मूल्यवान है. यह दूध में विद्यमान मक्खन की तरह है. जो आसानी से प्राप्त नहीं हो सकती.

समय की मार एवं अनगिनत कायस्थ संगठनों से क्षुब्ध आम कायस्थ आत्मकेंद्रित होता जा रहा है जिसे पूर्ववत गरिमा की ओर मोड़ने में बहुत परिश्रम है. अपना घर संभालते हुए यह सब करना कठिन ही नहीं अत्यंत दुष्कर कार्य है. हमें संतोष है कि इस विपरीत परिस्थिति में भी कुछ मेधावी एवं परिश्रमी भागीरथ मिले है, जिनके बल पर हम परस्पर विश्वास, सहयोग एवं एकता की गंगा बहा सकते हैं. आप सामाजिक प्रदुषण को देख रहे हैं, समझ रहें हैं. वे हमारे समाज के लोग ही हैं जिनके पापों को धोने का प्रयास हम सब कर रहे हैं. आज भी लोग ऐसा करने से बाज नहीं आ रहे हैं. हम उनसे नाराज नहीं है, बल्कि उनकी बुद्धि पर विस्मित हैं. समाज आँखे मूंदता है कुछ समय के लिए. पर जब आँखे खोलता है तो ऐसे लोगों का कोई वजूद नहीं रहता. यह चीज सभी पर लागू होती है. इसलिए हमें भी गलत कामों से बचना होगा. आपके मन में यह विचार भी आता होगा की क्यों मैं अपना समय, धन खर्च कर, एवं गालियाँ खाकर समाज का काम करूँ? आप जानते हैं कि हर काल में समाज पर यह संकट आया है पर समाज के अनाम लोगों ने ही उसका प्रतिकार भी किया है. आप काम करेंगे और आपके काम से एक का भी भला हो गया तो आपको इतना आत्म संतोष मिलेगा कि उतना सौ तीर्थों के भ्रमण पर भी नहीं मिल सकता.

हमें महिलाओं को भी मजबूती से जोड़ना है, बच्चों को भी जोड़ना होगा ताकि समाज के बारे में उनकी समझ बढे. समाज के सेवार्थ उठे इनके हाँथ को ताकत देनी होगी. महिलाओं की भागीदारी के बिना हमारा कार्य त्वरित गति और सही दिशा में आगे बढ़ ही नहीं सकता. हमारा प्रयास है कि हम ऐसे लोगों को जोड़ें जो सही रूप से कार्य कर सकते हों. हमें निष्क्रिय लोगों को जोड़कर पदाधिकारियों की संख्या नहीं बढानी चाहिए. जो काम करेगा उसे समस्याए भी होंगी और उसके निराकरण के लिए प्रयास भी करेगा. काम नहीं करनेवाले के पास कुछ भी नहीं होगा कहने के लिए. सिवाय अपनी समस्या गिनाने की.

अपने समाज में कुछ प्रगति हो रही है या नहीं, पर एक चीज की प्रगति तो है और वह है नित नयी कायस्थ संगठनो का गठन. हमारे समाज में कुछ सौ-पचास लोग ऐसे है जो सभी संगठनो में प्रायः दिख जायेंगे. उनका किसी संगठन से कोई लेना देना नहीं. उनका काम है अपना पोर्टफोलियो बनाना. संगठन कर्ता को यह एहसास होता है कि उनका संगठन तो काफी प्रभावी है, समर्थन मिल रहा है. अमुक-अमुक बाबु उनके साथ हैं और दो चार दस लोगों के साथ लेकर चलते रहते है. दरअसल ऐसे लोग समाज की एकता में बहुत बड़ी बाधा हैं. ऐसा मै मानता हूँ. दूसरी जातियों में इतने संगठन नहीं मिलेंगे.

मैं एक सज्जन से मिलने गया था तथाकथित बड़े नाम थे. सोचा, शायद उनका साथ मिल जाएगा तो हमारे संगठन को और ताकत मिल जाएगी. उन्होंने पूछा कि आपके साथ कौन-कौन बड़े आदमी हैं? मैंने कहा की बड़े आदमी कौन-कौन है, मुझे पता नहीं? मुझे तो बडा आदमी कोई दिखा नहीं है. तब उन्होंने कुछ बड़े आदमियों के नाम गिनाये और पूछा कि क्या वे आपके साथ हैं? मैं सच कहता हूँ कि जिन्हें मै जोड़ने गया था, अपने उस सोच पर ही मै शर्मिंदा हो गया.

मेरे भाइयों, आप सब जो यहाँ बैठे हुए हैं आपसे से बड़ा आदमी मेरी नजर में कोई और नहीं हो सकता. आप सब अपना काम छोड़कर, भाडा लगाकर अथवा अपनी गाडी का ईंधन खर्च कर समाज के काम के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं. आपकी शिक्षा, योग्यता, धन-वैभव क्या है, मैं नहीं जानता. पर एक चीज जान रहा हूँ- आप सबसे बड़े, सबसे धनवान और सबसे ज्यादा शिक्षित हैं, जो समाज सेवा के लिए निकले हैं. बड़े व्यापारी, बड़े पदाधिकारी, बड़े इंजिनियर, बड़े वकील, बड़े डॉक्टर, बड़े नेता न जाने कितने बड़े-बड़े. पर समाज निर्माण में कोई योगदान नहीं. बड़ा-बड़ा दंभ, बड़े–बड़े अहंकार. बड़े लोगों की विकृत हो चुकी परिभाषा को फिर से परिभाषित करनी होगी. बड़ा पद हो सकता है. ज्यादा धन हो सकता है पर घर में तो वह किसी का बेटा, भतीजा, चाचा, भांजा मामा ही होगा. वह टिंकू, मिंकू, मुन्ना, टून्ना हो सकता है. उसे भी हमारी तरह समाज के लिए सोचना होगा. अगर वह ऐसा करता है तो निःसंदेह वह बड़ा होगा. कायस्थ एक परिवार है, संस्कार है, संस्कृति है. एक पिता के संतान हैं हम सब. हमसब घमंड नहीं, गर्व करें. कैसे बनेगा समाज? सभी लोगों को समाज निर्माण के लिए एकजुट करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए. – महथा ब्रज भूषण सिन्हा, झारखण्ड प्रदेश अध्यक्ष. चित्रगुप्तः नमस्तुते

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