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कानपुर समागम का यथार्थ – राजनितिक दुश्चक्रों में फंसता कायस्थ समाज -महथा ब्रज भूषण सिन्हा

बहु प्रतीक्षित कानपुर समागम संपन्न हो गया. इसके साथ ही कायस्थ समाज कई प्रश्नों व तथ्यों के भंवर में डूबने व उतराने लगा है. यह समागम राष्ट्रीय कायस्थ महासमागम नाम से प्रचारित था जिससे समाज की आकांक्षाएं एवं उत्कंठाए चरम पर थी. सामजिक नेता भी अपनी-अपनी भूमिका की प्रतीक्षा कर रहे थे तो समाज भी आशा भरी निगाहों से समागम से निकलने वाले सत्व की प्रतीक्षा कर रहा था, जिसे अनावश्यक नहीं कहा जा सकता. कुछ सामाजिक नेता इसके स्वरूप को लेकर चिंतित भी दिखे तो कुछ पूरी तरह आश्वस्त भी थे. आयोजक बंधु तक सभी तरह के सन्देश भी पहुँच रहे थे पर आयोजकगण अपने आयोजन के प्रति इतने आश्वस्त थे की किसी के सुझाओं एवं भागीदारी की आवश्यकता सिरे से खारिज करते रहे. हरेक सम्मलेन अथवा समागम का एक उद्देश्य एवं कार्यक्रम होता है.
इस समागम का भी उद्देश्य एवं कार्यक्रम होगा पर आयोजकों को छोड़कर शायद ही किसी अन्य को कुछ भी मालूम होगा, सिवाय इसके कि सभी भेद-भाव भूलकर इसमे सम्मिलित हो जाना है चूँकि यह कायस्थ समाज की एकता एवं अस्तित्व का सवाल है. एकता एवं अस्तित्व का सवाल उठाकर कब तक हम लोगों किसी समागम या सम्मलेन में भाग लेने के लिए प्रेरित एवं भ्रमित करते रहेंगे. यह एक यक्ष प्रश्न है.
लोगों के एवं आयोजको के दावे अलग-अलग हैं, यह चिंतन का विषय नहीं है. आयोजन सफल है या असफल इस पर भी ज्यादा हाय-तौबा की जरुरत नहीं है. चिंता यह है की ऐसे आयोजन से कायस्थ समाज को मिलता क्या है? हर सम्मलेन या समागम में सामाजिक नेता उपेक्षित क्यों होते हैं? आयोजकों का यह दावा, कि उन्होंने किसी से कोई चंदा नहीं लिया. इससे ध्वनित होता है कि पैसा है हम कुछ भी करेंगे. यह सर्वथा अनुचित है. समाज को निजी पैसे का हिसाब नहीं चाहिए पर यह भी विचारनीए है कि क्या जिनके पास पैसा है उन्हें समाज को अपने स्व हित में इस्तेमाल करने की छुट है? एक व्यक्ति ने मुझे कहा कोई क्या करता है इस पर न जाएँ, अपना काम आप करें? मैंने उनसे भी पूछा और आप से भी पूछता हूँ कि क्या राष्ट्रीय कायस्थ महासमागम जैसे कार्य व्यक्तिगत होते हैं? क्या कायस्थ समाज को अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए? समाज को इस पर गंभीर विचार करना ही होगा. एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते कायस्थ समाज में होने वाली हर गतिविधि से हमे मतलब है, सरोकार है, पीड़ा है और ख़ुशी है. अभी हाल के वर्षों में एक ऐसी स्थिति देखने को मिली है कि लगभग 20 वर्ष से अखिल भारतीय कायस्थ महासभा जैसे गौरवशाली इतिहास रखनेवाले संगठन के शीर्ष पर बैठे लोग इसे अपनी सम्पति मान अदालती आदेश के बावजूद मृत्यु पर्यंत बने रहने की ख्वाहिस नहीं छोड़ पा रहे. पूरा संगठन अब एक गैरकानूनी गिरोह में परिणत हो गया है जो एक दुसरे को समर्थन देने में मशगुल है. दूसरी ओर संगठन के विधिक उतराधिकारी, संगठन के गौरवपूर्ण अस्तित्व को बचाने के लिए कठिन परिश्रम कर रहे हैं. यह भी कायस्थ समाज की विडम्बना ही कही जायगी कि संगठन में नेता/ पदाधिकारी सर्वसम्मति या चुनाव से नहीं, अदालती आदेश से बदले जाने पर विवश हो गया है. दुःख तब और बढ़ जाता है जब तथाकथित ऊँचे ओहदे या रसूख वाले लोग क़ानून की धज्जियाँ उड़ाने में सबसे आगे हैं. आज कौन कायस्थ समाज का श्रीमंत बनने के लायक हैं? कायस्थ समाज अब कोरे उपदेशों एवं आदर्श वाक्यों से नहीं चलने वाला. समाज को कर्मवीर व धर्मवीर चाहिए जो कम से कम इस तरह के समागम सम्मलेन से तो नहीं मिलने वाला. चलते-चलते एक बात और कहना चाहूँगा कि सामाजिक नेता राजनीतिज्ञों के आग़ोश में खेलना बंद करें. राजनीतिज्ञ चाहे हमारे समाज के हों, या अन्य समाज के, सबका DNA एक ही है. समाज राजनीतिज्ञ पैदा करता है, राजनीतिज्ञ समाज नहीं पैदा करते. अतः राजनीतिज्ञ की गर्दन समाज की हांथों में ही होनी चाहिए न कि राजनीतिज्ञ के हांथों में समाज की गर्दन. जय श्री चित्रगुप्त. - महथा ब्रज भूषण सिन्हा, रांची. ( भड़ास श्रेणी मे छपने वाले विचार लेखक के है और पूर्णत: निजी हैं , एवं कायस्थ खबर डॉट कॉम इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी कायस्थ खबर डॉट कॉम स्‍वागत करता है । आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया  kayasthakhabar@gmail.com पर भेज सकते हैं।  या नीचे कमेन्ट बॉक्स मे दे सकते है ,ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें।)

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