आखिर क्या कारण है की कायस्थ आगे बढ़ने के लिए अपनी जाती की पहचान को छुपाने लगते है ?सामजिक समन्वयता और सर्वमान्य नेता क्या अपनी जाती के नेता या प्रचारक बने रहते नहीं हो सकता ?क्या कायस्थ अपने ही सेकुलरिस्म और बुद्धिजीवी होने के भवर मे फसे नजर आते है Iझारखंड से कायस्थ चिन्तक MBB सिन्हा इस पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहते है की कायस्थ समाज हमेशा से ऐसे लोगो की महत्वाकांक्षा का शिकार रहा है ऐसे लोगो के कारण ही समाज गंभीर कार्य करने वालो पर ही सवाल उठा देते हैइलाहाबाद से कायस्थ राजनीती को दिशा देने मे लगे धीरेन्द्र श्रीवास्तव जो स्वय भी ऐसे ही एक बंद हुए पेज से भी जुड़े हुए थे इस पर रोष प्रकट करते हुए कहते है की कायस्थ समाज ऐसे ही लोगो के चलते टूट रहा है हर 2 चार साल मे एक नयी आवाज़ उठती है और फिर वो समाज को अपनी ढाल बना कर अपने हित साध लेते है और समाज को उसके हाल पर ही छोड़ देते है I ये पहले से होता आ रहा है हां सोशल मीडिया के आने से इसकी फ्रिक्वेंसी बढ़ गयी है क्योंकि अब फेसबुक पेज बनाना इतना कठिन काम नहीं हैवो जोर देकर कहते है की पहले भी ऐसे कई लोगो ने कायस्थ संगठन के नाम बिना संस्था बनाए लोगो को उसमे जोड़ कर कायस्थों को भ्रमित ही किया है I ऐसे मे उन्हें डमी संस्थाए कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि वो कायस्थ को डमी संस्था के नाम पर जमा करके फिर एक सर्व समाज मे असली संस्था बनाकर वहां स्थापित हो जाते है और कायस्थ समाज वस्तुत साल मे दो पूजा आयोजित करने वाला समाज बन कर रह जाता है Iसमाज को अभी कायस्थ समाजसेवियो के साथ साथ कायस्थ बिजनेसमैन की भी जरुरत है ताकि सामाजिक कार्यो के लिए फंड जमा हो सके I हालांकि कायस्थ बिजनेसमैन का झुकाव अभी इस तरफ कम ही है और उन्हें समाज के लिए या उसके साथ खड़े होने मे अपने ब्रांड के जातिवादी होने का डर लगा रहता है पर फिर भी उनमे से कुछ दिखावे के लिए ही सही मगर sis के चैयरमैन और राज्य सभा सांसद आर के सिन्हा जी के साथ खड़े होने लगे है ये भी बड़ा सच है की आर के सिन्हा जैसे कट्टर कायस्थवादी नेता के साथ जुड़े अधिकाँश लोग भी सामने तो कायस्थ समाज सेवी या कायस्थ माइंडेड बिजनेसमैन होने का दावा करते नजर आते है मगर उनके कायस्थ समाज मे योगदान करने के समय चेहरे बदल जाते है Iतो आखिर समाधान क्या है ?समाधान तो कायस्थ समाज के लोगो को खुद ही ढूंढना होगा ऐसी सभी डमी संस्थाओं और ग्रुपों/पेजेज के लोगो को पहचानना होगा और ऐसे लोगो को कायस्थ समाज के उदाहरण देना रोकना होगा I सौभाग्य से आज हमारे पास आर के सिन्हा , प्रदीप माथुर, आलोक संजर , नीरा शास्त्री , सुरेन्द्र कुलश्रेष्ठ , धीरेन्द्र श्रीवास्तव , वेद आशीष श्रीवास्तव , पंकज भैया , कुमार अनुपम , राजीव रंजन , रविनंदन सहाय, राकेश श्रीवास्तव, वैध राजीव सिन्हा, डा अरविन्द श्रीवास्तव , आलोक श्रीवास्तव, सुदर्शन सक्सेना , मनोज श्रीवास्तव (दिल्ली ) जैसे कई नाम है जो स्थापित होने के बाबजूद कायस्थ हितो के लिए खुल कर लड़ते दिखाई दे रहे है I तो युवाओं मे भी ललित सक्सेना , विवेक श्रीवास्तव (राजस्थान ), सच श्रीवास्तव , आदित्य श्रीवास्तव , निशांत सक्सेना आदि की एक बड़ी फ़ौज तैयार हो रही है I समाज को ऐसे ही लोगो के पीछे एक नयी लाइन तैयार करने की ज़रूरत है जो पहली और दूसरी पंक्ति मे खड़े इन लोगो के हाथ मजबूत कर सके I

आखिर राजनीती मे कायस्थ नेता क्यूँ नहीं पैदा होते ? – आशु भटनागर
आशु भटनागर I मुझे याद है कायस्थ खबर को शुरू करने के प्रारम्भिक दिनों जब मैं भोपाल मे कई वर्षो से कायस्थ समाज सेवा के कार्यो मे जुड़े वेद आशीष श्रीवास्तव से मिला तो उन्होंने कहा की कायस्थ समाज मे लोग ऐसी चीजे सिर्फ अपने खाली दिनों मे लाते है तुम्हे भी कल को कोई बड़ा मौका मिल जाएगा तो तुम भी अपना नया रास्ता बना लोगे या विदेश चले जायोगे I कायस्थ खबर के उद्देश्य को लेकर पहली ही मुलाक़ात मे इस तरह के जबाब ने मुझे थोडा विचलित तो किया मगर शायद मैं उनके वक्तव्य तो तब पूरा समझ नहीं पाया I हाँ उन्हें विश्वाश जरुर दिलाया की उनके कुछ अनुभव गलत हो सकते है मगर शायद समाज के बड़े हिस्से का सच ऐसा नहीं होगामगर पिछले दिनों हुई कुछ घटनाओ के सामने सामने आने पर मेरा ध्यान स्वत ही वेद आशीष श्रीवास्तव की उस बात पर चला गया जो उन्होंने मुझे लगभग 9 महीने पहले कही थी क्योंकि पिछले कुछ दिनों से २०००० से ज्यदा लोगो को जोड़ने वाले कुछ कायस्थ ग्रुप और कायस्थ पेजेज अचानक दिखने बंद हो गए I अचानक से हुए परिवर्तन के सन्देश जब मुझे मिले तो मेने सच्चाई का पता करने का प्रयत्न किया I मगर कोई ख़ास सफलता नहीं मिली कुछ जानकारों ने बताया की की ये सब बंद कर दिए गये क्योंकि इनसे अब कोई फायदा नहीं था I या यूँ कहे की ये बस खाली बैठे कायस्थ नवयुवको ने अपने बेरोजगारी के दिनों मे बनाये थे और चूँकि अब उनके पास रोजगार है और समाज मे जातिवादी दिखने से आगे की राह मुश्किल हो जाती है इसलिए इन्हें अब बंद करना ही बेह्टर है Iइन घटनाओं ने मुझे सोचने पर मजबूर किया की आखिर राजनैतिक तोर पर कायस्थ पीछे क्यूँ है आखिर क्या कारण है की कायस्थ समाज के लोग जिस सीडी पर पाँव रख कर आगे चलते है उसी से उन्हें एलर्जी होने लगती है I
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