वस्तुतः जो सामाजिक या धार्मिक संगठन कायस्थों को राजनातिक स्थायित्व देने का माध्यम होने चाह्यी थी वो राजनीती के हाथो मे फसती नजर आ रही है I देखा जाए तो इस समय हर कायस्थ संगठन के पीछे एक विशेष पार्टी या राजनैतिक व्यक्तित्व के लिए कायस्थ समाज को मोड़ने की संभावनाओं पर ही कोशिशे की जा रही है I जिसके चलते ये लोग आपस मे ही ही कायस्थ एकता की जगह राजनीती को एक दुसरे पर थोपने लगते हैदुर्भाग्य से सोशल मीडिया पर भी बने अधिकाँश कायस्थ कायस्थ ग्रुप या सक्रीय लोग किसी ना किसी राजनैतिक विचारधारा को ही पुष्ट करते दिखाई दे रहे है I जिससे कायस्थ समाज का वो हिस्सा जो वोट देने का काम करेगा इस सब से दूर ही रहना पसंद कर रहा है I ये एक कडवा सच है अभी तक भी कोई कायस्थ नेता या संस्था समस्त कायस्थ समाज पर अपना प्रभाव ज़माने मे असफल रही है I हाँ पिछले १५ सालो मे कायस्थ समाज की एक बड़ी संस्था मे पदों को लेकर हुई लड़ाई मे कायस्थ समाज का नुक्सान ज़रूर कर दिया हैऐसे मे २०१७ के यूपी चुनावों मे कायस्थ किस और जाए और किस पार्टी को एक तरफ़ा वोट दें ये एक यक्ष प्रशन बनता जा रहा है I देखा जाए तो यूपी चुनावों मे चारो ही बड़े राजनैतिक दलों के संभावित उम्मीदवारों मे कायस्थ समाज के संभावित उम्मीदवारों की संख्या ना के बराबर है I अभी तक अगर हम सारी पार्टियों के कायस्थ प्रत्याशियों की संख्या को भी जोड़ लें तो ये २० से उपर जाती नहीं दिख रही है जबकि यूपी के राजनैतिक गणित मे कम से कम ५० सीटो पर कायस्थ निर्णायक है Iयूपी की कायस्थ राजनीती मे वर्षो से अपनी साख बनाए नेता नये नेताओं को लेकर क्या योजनाये बना रहे है अभी तक किसी ने स्पस्ट भी नहीं किया है I ऐसे मे कायस्थ संगठनो की आपसी प्रतिद्वंदिता और टांग खींचने मे लगी होड़ कायस्थों को क्या राजनैतिक लाभ दे पाएंगी इसको आंकलन बेहद साफ़ है की कायस्थ वोटो के विखारव की स्थिति मे सभी पार्टियाँ एक बार फिर बिहार की तर्ज पर कायस्थों को इग्नोर ही करेंगी I और हम और हमारे नेता फिर से हाथ मलते रह जायेंगी
2017 के लिए यूपी की राजनीती और कायस्थ समाज
२०१६ शुरू हो चुका है और इसी के साथ कायस्थ समाज मे 2 ध्रुव बनते दिखाई देने शुरू हो गये है जिन्हें हम सामाजिक और धार्मिक कह सकते है दोनों ही सोच के लोग एक ही बात कहते है की कायस्थ समाज मे एकता होनी चाह्यी I हाँ प्रेम भक्ति और ज्ञान भक्ति की तरह दोनों ही एक ही मंजिल पर पहुँचने के अलग अलग मार्ग है और शायद दोनों सही भी हो I मगर असली खेल तब शुरू होता है जब हम इनके पीछे होती राजनीती से भ्रमित हो जाते है
वस्तुतः जो सामाजिक या धार्मिक संगठन कायस्थों को राजनातिक स्थायित्व देने का माध्यम होने चाह्यी थी वो राजनीती के हाथो मे फसती नजर आ रही है I देखा जाए तो इस समय हर कायस्थ संगठन के पीछे एक विशेष पार्टी या राजनैतिक व्यक्तित्व के लिए कायस्थ समाज को मोड़ने की संभावनाओं पर ही कोशिशे की जा रही है I जिसके चलते ये लोग आपस मे ही ही कायस्थ एकता की जगह राजनीती को एक दुसरे पर थोपने लगते हैदुर्भाग्य से सोशल मीडिया पर भी बने अधिकाँश कायस्थ कायस्थ ग्रुप या सक्रीय लोग किसी ना किसी राजनैतिक विचारधारा को ही पुष्ट करते दिखाई दे रहे है I जिससे कायस्थ समाज का वो हिस्सा जो वोट देने का काम करेगा इस सब से दूर ही रहना पसंद कर रहा है I ये एक कडवा सच है अभी तक भी कोई कायस्थ नेता या संस्था समस्त कायस्थ समाज पर अपना प्रभाव ज़माने मे असफल रही है I हाँ पिछले १५ सालो मे कायस्थ समाज की एक बड़ी संस्था मे पदों को लेकर हुई लड़ाई मे कायस्थ समाज का नुक्सान ज़रूर कर दिया हैऐसे मे २०१७ के यूपी चुनावों मे कायस्थ किस और जाए और किस पार्टी को एक तरफ़ा वोट दें ये एक यक्ष प्रशन बनता जा रहा है I देखा जाए तो यूपी चुनावों मे चारो ही बड़े राजनैतिक दलों के संभावित उम्मीदवारों मे कायस्थ समाज के संभावित उम्मीदवारों की संख्या ना के बराबर है I अभी तक अगर हम सारी पार्टियों के कायस्थ प्रत्याशियों की संख्या को भी जोड़ लें तो ये २० से उपर जाती नहीं दिख रही है जबकि यूपी के राजनैतिक गणित मे कम से कम ५० सीटो पर कायस्थ निर्णायक है Iयूपी की कायस्थ राजनीती मे वर्षो से अपनी साख बनाए नेता नये नेताओं को लेकर क्या योजनाये बना रहे है अभी तक किसी ने स्पस्ट भी नहीं किया है I ऐसे मे कायस्थ संगठनो की आपसी प्रतिद्वंदिता और टांग खींचने मे लगी होड़ कायस्थों को क्या राजनैतिक लाभ दे पाएंगी इसको आंकलन बेहद साफ़ है की कायस्थ वोटो के विखारव की स्थिति मे सभी पार्टियाँ एक बार फिर बिहार की तर्ज पर कायस्थों को इग्नोर ही करेंगी I और हम और हमारे नेता फिर से हाथ मलते रह जायेंगी
वस्तुतः जो सामाजिक या धार्मिक संगठन कायस्थों को राजनातिक स्थायित्व देने का माध्यम होने चाह्यी थी वो राजनीती के हाथो मे फसती नजर आ रही है I देखा जाए तो इस समय हर कायस्थ संगठन के पीछे एक विशेष पार्टी या राजनैतिक व्यक्तित्व के लिए कायस्थ समाज को मोड़ने की संभावनाओं पर ही कोशिशे की जा रही है I जिसके चलते ये लोग आपस मे ही ही कायस्थ एकता की जगह राजनीती को एक दुसरे पर थोपने लगते हैदुर्भाग्य से सोशल मीडिया पर भी बने अधिकाँश कायस्थ कायस्थ ग्रुप या सक्रीय लोग किसी ना किसी राजनैतिक विचारधारा को ही पुष्ट करते दिखाई दे रहे है I जिससे कायस्थ समाज का वो हिस्सा जो वोट देने का काम करेगा इस सब से दूर ही रहना पसंद कर रहा है I ये एक कडवा सच है अभी तक भी कोई कायस्थ नेता या संस्था समस्त कायस्थ समाज पर अपना प्रभाव ज़माने मे असफल रही है I हाँ पिछले १५ सालो मे कायस्थ समाज की एक बड़ी संस्था मे पदों को लेकर हुई लड़ाई मे कायस्थ समाज का नुक्सान ज़रूर कर दिया हैऐसे मे २०१७ के यूपी चुनावों मे कायस्थ किस और जाए और किस पार्टी को एक तरफ़ा वोट दें ये एक यक्ष प्रशन बनता जा रहा है I देखा जाए तो यूपी चुनावों मे चारो ही बड़े राजनैतिक दलों के संभावित उम्मीदवारों मे कायस्थ समाज के संभावित उम्मीदवारों की संख्या ना के बराबर है I अभी तक अगर हम सारी पार्टियों के कायस्थ प्रत्याशियों की संख्या को भी जोड़ लें तो ये २० से उपर जाती नहीं दिख रही है जबकि यूपी के राजनैतिक गणित मे कम से कम ५० सीटो पर कायस्थ निर्णायक है Iयूपी की कायस्थ राजनीती मे वर्षो से अपनी साख बनाए नेता नये नेताओं को लेकर क्या योजनाये बना रहे है अभी तक किसी ने स्पस्ट भी नहीं किया है I ऐसे मे कायस्थ संगठनो की आपसी प्रतिद्वंदिता और टांग खींचने मे लगी होड़ कायस्थों को क्या राजनैतिक लाभ दे पाएंगी इसको आंकलन बेहद साफ़ है की कायस्थ वोटो के विखारव की स्थिति मे सभी पार्टियाँ एक बार फिर बिहार की तर्ज पर कायस्थों को इग्नोर ही करेंगी I और हम और हमारे नेता फिर से हाथ मलते रह जायेंगी
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