एक कहावत है कि वही समुदाय और जाति अपने उत्थान के साथ साथ समाज का उत्थान कर सकती है, जिसमें जागरूकता हो,और उसमें गुणों को ग्रहण करने की शक्ति हो. यह सवाल हम आप सबसे है कि हम और हमारा कायस्थ समाज अपने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कल्याण के उद्देश्य को लेकर कितना जागरूक है?कायस्थ समुदाय के कल्याण के नाम पर बने कायस्थ संगठनों और महासभाओं से भी यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने कायस्थ समाज में इस तरह की जागरूकता का प्रसार करने के लिए अब तक क्या किया है? यदि नहीं किया है, तो क्यों नहीं किया है, और यदि किया है ,तो दूसरी जातियों की तरह कायस्थ समुदाय अब तक जागरूक क्यों नहीं हो पाया है? जाहिर है, कि इस सवाल का जवाब न तो हमारे आप के पास है, और न कायस्थ संगठनों और महासभाओं के पास ही. यदि हमने समुदाय के उत्थान के लिए कुछ किया होता, तब तो हमारे पास कोई जवाब होता.दरअसल कायस्थ समुदाय के उत्थान के लिए अब कुछ कदम आगे बढ़ाने की आवश्यकता है. देश भर के कायस्थ महासभाओं और संगठनों को किसी काम लायक बनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कार्यकारिणी और परामर्श मंडल के गठन की आवश्यकता है, ताकि राष्ट्रीय कार्यकारिणी और परामर्श मंडल देश भर के कायस्थ संगठनों को एक सूत्र और दिशा निर्देश में पिरो कर राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ और एक समान उद्देश्य के साथ विभिन्न कार्यक्रमों का संचालन किया जा सके. इस प्रकार की यदि कोई व्यवस्था होगी, तभी कायस्थ समुदाय के भीतर विभिन्न प्रकार के जन जागरूकता और उत्थान के कार्यक्रम प्रभावी रूप से चलाए जा सकेंगे. विभिन्न प्रकार के जन कल्याणकारी कार्यों के प्रतिपादन में भी इस प्रकार की व्यवस्था अत्यंत प्रभावी साबित होगी. इस प्रकार की व्यवस्था में ही कायस्थ एकता का सपना साकार हो सकता है. जहां इतने सारे मुद्दों पर विचार विमर्श हो रहा है, वहां इस मुद्दे पर भी विचार कर के देखिए. हो सकता है, कोई बेहतर रास्ता निकल ही आए. जय चित्रांशी राकेश श्रीवास्तव

कायस्थ समुदाय के उत्थान के लिए अब कुछ कदम आगे बढ़ाने की आवश्यकता है – राकेश श्रीवास्तव
प्रिय बंधु,
आजकल ह्वाट्स एप्स पर कायस्थ समुदायियों के विभिन्न प्रकार के विचारों और विमर्शों से अवगत होने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है. यह एक प्रकार से एक सुखद संकेत ही है कि भले ही बात और विचार के माध्यम से लोग कायस्थ समुदाय की एकता और कल्याण की बात सोचने तो लगे हैं. किसी भी अभियान या क्रांति की शुरूआत वैचारिक आदान प्रदान से ही होती है और वैचारिक आदान प्रदान के अनुरूप कार्यशैली और कार्यक्रम का निर्धारण होता है. अगर कार्यक्रम और कार्यशैली का निर्माण समय के अनुरूप और उद्देश्य को ध्यान में रख कर किया जाता है, तो सफलता भी निश्चित रूप से मिल ही जाती है.अब सवाल यह है कि क्या हम वैचारिक विमर्श के अगले चरण, यानी कार्यशैली और कार्यक्रम के निर्माण के दौर में अब तक प्रवेश कर पाए हैं या नहीं? यदि नहीं, तो इसका कारण क्या है, और यदि हां, तो कार्यक्रम और कार्यशैली क्या है? अफसोस की बात यह है कि हमारे देश में कायस्थ संगठनों और महासभाओं की तादाद हजारों में है, पर उनमें से शायद ही किसी के पास कायस्थ समुदाय के राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक और सामुदायिक कल्याण और उत्थान के लिए शायद ही कोई ठोस एवं सटीक योजना हो.कायस्थ कल्याण के नाम पर महज कुछ राजनीतिक नेताओ को भाषण दिला कर, या फिर उन्हें अपनी संस्था का कर्ता धर्ता बना कर खुद को धन्य मान लेते हैं. इस तरह की कार्यशैली का अंजाम भी बीरबल की खिचड़ी जैसा ही होगा. पता नहीं बीरबल की खिचड़ी कब तैयार होगी, और कब उसका भोग लगेगा, कोई नहीं जानता. इस तरह की कार्यशैली वाली संस्थाओं से कायस्थ कल्याण की कल्पना नहीं की जा सकती.
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