प्राचीन काल में शासकों द्वारा सम्मानपद, भूमि पटटे आदि ताम्रपत्र पर लिखकर दिये जाते थे। सातवीं शताब्दी में भास्करवर्मन द्वारा प्रदत्त पंचखंड (सिलहट) ताम्रपत्र में न्यायकर्णिका (मजिस्ट्रेट), जनार्दन स्वामी और व्यावहारिक (न्यायविद) हर दत्त कायस्थ का उल्लेख मिलता है। ”अर्ली हिस्ट्री ऑफ कामरुप” के अनुसार उस समय वहाँ के शासक शशांक थे। यह ताम्र पत्र भास्कर वर्मन ने कर्णसुवर्ण (आसामी साहित्यानुसार कर्णपुर) में प्रदान किया था। यह स्थान वर्तमान बंगलादेश में पड़ता है।सर एडवर्ड गेट लिखित ‘ए हिस्ट्री ऑफ आसाम’ के अनुसार ब्रह्रापुत्र नदी के दक्षिण में अनेकों छोटे-छोटे सरदार रहते थे। अपने प्रदेश में स्वतंत्र होते हुए भी वे बाह्रा आक्रमण के समय आपस में मिलकर रक्षा करते थे। यह सभी कायस्थ थे तथा आसाम के इतिहास में ‘बारा भुइयाँ ‘ के नाम से जाने जाते हैं। यहा बारा का तात्पर्य अंक बारह से है तथा भुइयाँ का अर्थ है भूस्वामी अथवा जमींदार। कूच बिहार के शासक नारायण के दरबार में 12 मंत्री थे। सम्भवतया इसी के आधार पर बारा का अंक शासक के बाद प्रमुख व्यक्ति के नाम के साथ जोड़ने की परम्परा प्रचलित हो गर्इ।चौदहवीं शताब्दी के आरम्भ में प्रताप ध्वज के पुत्र दुर्लभ नारायण गौर सिंहासनारुढ़ हुए। जितारी वंश के धर्म नारायण ने कामातापुर को अपनी राजधानी बनाया। ये दोनों ही शासक कायस्थ थे। चौदहवीं शताब्दी में ही सिला ग्राम (वर्तमान नलवारी जिलान्तर्गत) के कायस्थ शिक्षाविद कविरत्न सरस्वती ने अपने काव्य ‘जयद्रथ वध’ में पाल शासक दुर्लव नारायण और इन्द्र नारायण का उल्लेख कायस्थ के रुप में किया है।‘गुरु चरित’ के अनुसार आरम्भ में 6 ब्राह्राण-कृष्ण पंडित रघुपति, रामवर, लोहार, वारन, धरम और मथुरा तथा 6 ही कायस्थ-चन्दीवर, श्रीधर, हरी, श्रीपति, चिदानन्द और सदानन्द ने कन्नौज से आकर गौर में शरण ली। वहां के शासक ने ‘बारा भुइयाँ’ की पदवी तथा भूमि प्रदान कर अपने राज्य में बसा लिया। उनके मूल आवास के आधार पर उस स्थान का नाम कन्नौजपुरा पड़ गया। तदोपरान्त धर्म नारायण के आग्रह पर गौर शासक दुर्लभ नारायण ने उनको कामातपुर भेज दिया। जहाँ उनको भूमि तथा दास देकर बसा दिया गया। कुछ समय पश्चात अन्य ब्राह्राण तथा कायस्थ भी गौर होते हुए कामरुप पहुँचे और बारा भुइयाँ के रुप में वहीं बस गये।सुप्रसिद्ध बारा भुइयाँ शिक्षाविद चंडीवार शिरोमणि की पदवी से विभूषित किये गये। चंडीवार के पुत्र राजधर अली फुकरी में बस गये। उनके पुत्र सूर्यवार, पौत्र कुसुमवार शिरोमणि भुइयां तथा प्रपौत्र शंकर देव ने राज्य किया। श्री शंकर देव आसाम के एक सुप्रसिद्ध संत हुए। उन्होंने ‘एक सरल नाम धर्म’ की स्थापना की। अपने भक्ति कथानकों में उन्होंने स्वंय को ‘कायस्थ संकर’ के रुप में प्रदर्शित किया है। कालान्तर में लगभग सभी बारा भुइयाँ कायस्थ उनके मत को स्वीकार कर विष्णु के उपासक बन गये।प्रारम्भ से ही कामरुपीय कायस्थ अपने लिए भुइयाँ, गिरि, राय, दत्ता, वासु व घोष, उपनाम तथा पदवी स्वरुप सिकंदर, मजूमदार, चौधरी, गोमाश्ता, भंजार कायस्थ बरुआ आदि का प्रयोग करते रहे हैं। इसी प्रकार धार्मिक क्षेत्र में उनके उपनाम हैं – ठाकुर, अधिकारी, गोस्वामी, महन्त और मेधी।साहित्यरत्न हरि नारायण दत्ता बरुआ द्वारा लिखित लगभग 900 पृष्ठों का एक बृहद ग्रंथ ‘प्राचीन कामरुपीय कायस्थ समाज इति वृत’ उपलब्ध है। इसमें प्राचीन कामरुप कायस्थों से सम्बंधित समस्त तथ्यों पर ऐतिहासिक, भौगोलिक तथा अन्याय द्रष्टिकोणों से विस्तृत विवेचन किया गया है।नीरज श्रीवास्तव के फेसबुक वाल से

प्राचीन कामरुप कायस्थ समाज
‘’ हमारे देश का पूर्वोत्तर प्रान्त आसाम प्राचीन काल में महाभारत में प्राग ज्योतिष तथा पुराणों में कामरुप के नाम से विख्यात रहा है। इसका विस्तार दक्षिण में बंगाल की खाड़ी और गोहाटी के निकट कामाख्या देवी का मंदिर इसका केन्द्र रहा है। श्री नगेन्द्र नाथ बसु द्वारा लिखित ‘सोशल हिस्ट्री ऑफ कामरुप’ के अनुसार प्राच्य विधा महार्नव से कन्नौज के निवासी थे। राजा दुर्लव नारायण के शासन काल में वे बंगाल के गौर राज्य में बस गये इनमें से तमाम कायस्थ कामरुप कामाख्या चले गये, जहा राजा धर्म नारायण ने उनको भूमि उच्च पद आदि दिये। कामरुप कायस्थों में नाग शंकर व नागाक्ष ने चतुर्थ शताब्दी में राज्य किया और प्रतापगढ़ को राजधानी बनाया। इनके वंशज मीनाक्ष, गजंग, श्री रंग तथा मृगंग ने लगभग 200 वर्ष तक राज्य किया। कालान्तर में नाग कायस्थ, क्षत्रिय वंश कायस्थ भुइयाँ कहलाया। इस वंश के अंतिम शासक को मार कर जिताशी वंश के प्रताप सिंह ने आधिपत्य स्थापित किया। सातवीं शताब्दी के अंतिम चरण से ‘स्तम्भ’ वंश ने प्रागज्योतिषपुर पर दसवीं शताब्दी के अंत तक राज्य किया। इन्हीं के समय में कायस्थ घोष वंश कामरुप के पछिमी भाग में राज करने लगा। यह भाग ‘धाकुर’ के नाम से विख्यात था। धाकुर के पूर्व में वर्तमान गोआल पाड़ा जिले में क्षत्रिय कायस्थ धूत्र्तघोष ने राज्य बना लिया। इनके वंशज र्इश्वर घोष को कामरुप-कामाक्षा के शासक धर्मनारायण ने पराजित किया।
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