मित्रों बहुत दुख की बात है जो आज हम संगठित नहीं हो पा रहें हैं क्यों – कविता सक्सेना
मित्रों बहुत दुख की बात है जो आज हम संगठित नहीं हो पा रहें हैं क्यों ? क्योंकि हम मर्यादा बूलते जा रहे हैं? बड़ा दुःख होता है कि हम बड़े छोटे का लिहाज़ भूल चुके हैं। बड़ी शर्म आती है कि जब दूसरे जाति के लोग हमारा उपहासात्मक शब्दों में कहते हैं कि कायस्थ समाज कभी संगठित नहीं होता। जो कायस्थ समाज की कभी इतनी इज्जत होती थी अन्य समाज हमरी सभ्यता का कायर था । हमारी पढ़ाई लिखाई और शालीनता का हमरी तीव्र वुध्दि हमरी ईमानदारी आदि खूबियों से नवाजा जाता था । \आज वो समाज किस अभद्रता की ओर मुड़ रहा है। काहां है। हमारी संस्कृति कहां हैं हमारे संसकार । हम आपस में क्यों संगठित होते । अब तो जागो । कमसे कम हमे समे अपने पुर्खों की इज्जत का तो ख्याल रखना चाहिए हमरे कुल पिता क्या सोचते होगें । हमरे समाज से ही बड़े बड़े महा पुरुष भारत भूमि पर पैदा हुए । हमने क्या दिया ? केवल और केवल आपस में विघटन और टांग खिचाई करते रहते हैं । क्या हम आपसी भाईचारा खो चुके हैं । हमे इस विषय पर विचार करें ।धन्यवाद।। कविता सक्सेना ।।।
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