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कायस्थ समाज को आलोचना की जगह कार्य करने में लगना चाहिए – आलोक श्रीवास्तव

आलोचना व् बुराई में समय भी व्यर्थ होता है और सम्बन्ध भी ख़राब होते है ।। कुछ दिनों से हम सभी लोग एक सही विषय पर चर्चा कर रहे थे और गलत हो रहे कार्य की आलोचना कर रहे थे पर मुझे लगता है दोस्तों यह नकरात्मकता व् आलोचना करने से हमें बचना होगा क्योंकि यह मानसिक उन्माद है या कहे यह मानसिक रोग है । दुनिया अपने मनमर्जी से चल रही है सही गलत हर इंसान देख रहा है इसलिए बस दुनिया को देखते रहिये और मस्त रहिये । यदि कोई अपने पैसे या सुविधा से कुछ करता है तो यह उसका विशेषाधिकार है उसेंमें हमें ऐतराज नही होना चाहिए । दुनिया को हम खुद की निगाह से नही बल्कि सामने वाले की निगाह से देखना चाहिए क्योंकि सामने वाला क्या सोच रहा है यह पता चलता है ।। खुद पर विश्वास रखिये क्योंकि आत्म सम्मान से बढ़ा कुछ नही है कुत्ता कितने बड़े महल में रहे या कितना महंगा महंगा व्यंजन खाय उसके गले में पट्टा साहब का ही होता है ।। आप न तो किसी की बुराई/निन्दा सुनें और न ही दूसरों को इसके लिए पे्ररित करें। आप थोड़ा व्यवहार कुशल बन कर दृढ़ता दिखावें एवं दूसरों की बुराई करने वाले व्यक्ति को तुरन्त आग्रह कर ऐसा करने से रोक दें। हमें ध्यान रखना चाहिए कि किसी की आलोचना करने से कोई फायदा नहीं होता। आलोचना खतरनाक होती है। इससे उस व्यक्ति के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है और वह बदले की भावना से कार्य करने लगता है। यानि जिसके लिए आलोचना की जाती है उस स्थिति में कोई सुधार नहीं आता है, बल्कि स्थिति और बिगड़ जाती है। अत: लोगों की आलोचना, निन्दा या बुराई करने के बजाय हमें उन्हें समझने का प्रयास करना चाहिए और समझना चाहिए कि जो काम वे करते हैं उन्हें वे क्यों करते हैं। उन्हें नम्रतापूर्वक अपने मन के विचार बतावें। आलोचना करने का अधिकार केवल उसे हैं जिसके दिल में मदद करने की इच्छा है। अत: आलोचना करने के बजाय सृजनात्मक सुझाव दें। आलोचक या बुराई करने वाले को कोई पसंद नहीं करता। लोग उन लोगों के प्रति आकर्षित होते हैं जो उन्हें पसन्द करते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं। लोग उनके प्रति आकर्षित नहीं होते, जो उनका मूल्यांकन और आलोचना करते हैं। कुछ लोग अपने से अधिक योग्य और सफल लोगों की निन्दा करके एक प्रकार का निम्न कोटि का आनन्द प्राप्त करते हैं। कुछ लोग सोचते है कि दूसरों के गुणों की प्रशंसा करना मानों अपनी कमी को स्वीकार करना है। इसलिए ऐसे लोग दूसरों की किसी प्रकार की प्रशंसा नहीं करते और सही या गलत आलोचना करने से भी नहीं झिझकते। गौतम बुद्ध ने कहा है- लोग मौनी की निन्दा करते हैं, बोलने वाले की निन्दा करते है और अल्पभाषी को भी नहीं छोड़ते। संसार की आलोचना से कोई नहीं बच सकता। अत: यदि आप आश्वस्त है कि आप जो कर रहे हैं वह सही है तो आप ऐसी आलोचनाओं की उपेक्षा कर अलोक श्रीवस्तव

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