हमारे आदरणीय प्रधानमन्त्री जी की नजर में तथाकथित चार वर्ग- ब्राह्मण, कायस्थ, क्षत्रिय एवं भूमिहार दोयम दर्जे पर हैं. अतीत में इन वर्गों के नेताओं के द्वारा राष्ट्र के लिए दिए गए अविस्मरणीय योगदान तक नकारा जा रहा है.डॉ राजेन्द्र प्रसाद जैसे अप्रतिम नेता का स्थान अब डॉ भीम राव आंबेडकर से भरी जा रही है. कल जब मोदी जी के मुख से आम्बेडकर को महान अर्थशास्त्री की संज्ञा दी गई तो हम अचंभित रह गए. संविधान निर्माता तो वे पहले ही घोषित कर चुके हैं, जो डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी का स्थान था. हमारे राजनेता कहलाने वाले बड़े-बड़े मंत्री एवं सांसद भी यह हिम्मत नहीं जुटा पा रहे कि वे डॉ राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री एवं जयप्रकाश नारायण सहित अन्य कुलगौरवों की समृद्ध विरासत पर दो शब्द भी बोल सकें.ऐसा क्यों हो रहा है? बंधुओं, ऐसा इसलिय कि हमारे पास दृढ़ निश्चयी, दूरदर्शी, उच्च नैतिकता से परिपूर्ण एवं सक्षम सामाजिक नेता नहीं हैं. स्व-प्रशस्तिगान में लिप्त हमारे भाई अपने गुणगान करतेहुए सामाजिक अवरोध बने रहेंगे तो हम सदैव अपनी बाजी हारते रहेंगे. लक्ष्य कठिन है पर असाध्य नहीं, अगर हम ठान लें. हमें 2017 की चुनौतियों का सामना करने के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ एवं अविचल होना पड़ेगा. एक बार पुनः नव वर्ष की शुभ मंगल कामनाएं. -महथा ब्रज भूषण सिन्हा.

कायस्थ खबर वार्षिक लेखा जोखा : 2016 में कायस्थ समाज का विश्लेषण एवं 2017 की चुनौतियाँ -महथा ब्रज भूषण सिन्हा
सर्वप्रथम 2017 की अनंत बधाई एवं शुभ मंगल कामनाएं.
समय गतिमान है. इसका चक्र रुकने वाला नहीं है. हमारे सभी भाई-बंधु के जीवन का एक वर्ष खिसक गया. सभी को आने वाले दिनों की नयी चुनौतियों का सामना करना है. अतः हमें बीते वर्ष के अनुभवों से सबक लेते हुए गलतियाँ सुधारना और विकास पथ पर आगे बढ़ना है.
बीती ताहि बिसारिय, आगे की सुध लेह.
संगठनों के जाल से घिरा कायस्थ समाज की विडम्बनाएं असीमित है. हमें इसमे सामंजस्य का सूत्र तलाशना, इस वर्ष की सबसे बड़ी, पहली और खुली चुनौती है. समाज में दूसरी बड़ी चुनौती कायस्थ को कायस्थ बनाए रखने की है. कायस्थ का अर्थ जाति से परे हटकर संस्कार और संस्कृति का है. अगर हमें विशिष्ट बने रहना है तो हमें अपने जड़ों की ओर लौटना होगा एवं उसे पुख्ता करना होगा. विगत वर्षों में हम जिस आपसी मतभेद के शिकार रहे हैं, उसका अंत सिर्फ एकता-एकता के तोता रटंत से नहीं होगा. हमें उद्देश्यपरक कार्य करने होंगे.
वर्ष के समाप्त होते न होते हमारे कई भाई-बहनों को चिकित्सा के बेतहासा खर्च के लिए समाज की ओर देखना पड़ा है. समाज उनके मदद के लिए आगे भी आया है. यह हमें हौसला तो देता है, पर यह समस्या का समाधान नहीं हो सकता है. हमें कुछ ऐसे विशेष उपाय करने होंगे ताकि बड़ी राशी की सहायता की समस्या ही न आये. समाज के लोगों की अपेक्षाय बढ़ी है तो सभी समाजसेवी, नेता एवं समाज चिंतकों की यह जिम्मेदारी बनती है कि सही रास्ते तलाशे जाएँ.अभी देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में राज्य विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, जहाँ कायस्थों की आबादी सभी अन्य राज्यों से अधिक है. पर राजनितिक भागीदारी कायस्थ आबादी के अनुरूप नहीं है. इसका कारण सिर्फ कायस्थ समाज की एकता नहीं है. वे नेता भी जिम्मेवार हैं, जो राजनीति में व शासन में आगे निकल जाने के बाद अपने समाज के प्रति कोई जिम्मेवारी का अहसास तक नहीं कर पाते. यह समस्या सिर्फ उत्तर प्रदेश की ही नहीं है. बिहार झारखंड भी राजनीतिक कायस्थ नेताओं के व्यवहार से उतना ही दुखी है. आज हमें यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि राजनीति में हार जाने के बाद ऐसे नेताओं को समाज भी नजरअंदाज करने लगता है और उनकी स्थिति हास्यास्पद हो जाती है. फिर उनका सीधा काम समाज में विघटन कराने का ही रह जाता है. अतः हमें इन्हें पहचानना होगा और सतर्क भी रहना होगा. हमारे भाई होते हुए भी राजनीति का नशा या स्वार्थ की परते इतनी गहरी हो जाती है कि वे सामाजिक संगठन को ही निर्जीव करने का प्रयास करने लगते हैं. हालांकि सामाजिक और राजनितिक नेतृत्व में इतना घालमेल है कि एक के बिना दूसरा आधारहीन हो जाता है. यह सच्चाई हमारे सभी राजनितिक भाईयों को भी समझना और समझाना जरुरी है.उत्तर प्रदेश में अभी जो राजनितिक स्थिति पैदा हुई है, वह जाति वर्चस्व का जीता जागता उदाहरण है. हमें अपने उत्तर प्रदेश समाज के लोगों को जागरूक कर इस स्थिति में कुछ अच्छा करने के लिए सोचना चाहिए. विभिन्न दलों में बंटे जिम्मेवार राजनितिक कायस्थ भाईयों को टिकट बंटवारे में अधिक से अधिक टिकट दिलवाने का प्रयास करना चाहिए. सामाजिक नेताओं को यह तय कर देना चाहिए कि हमारे कोई राजनितिक भाई समाज से बड़ा नहीं है और उन्हें सदैव समाज की भलाई के लिए बिना किन्तु-परन्तु खड़ा रहना होगा.
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