ये डॉ तारा सिन्हा हैं। प्रोफेसर रह चुकी हैं। शिक्षाविद हैं। चम्पारण सत्याग्रह की कथाएँ इन्हें तिथिवार याद हैं और राष्ट्रीय आंदोलन को लेकर इनकी अपनी बहुत गहरी समझ भी है। इस वजह से चम्पारण सत्याग्रह को लेकर आज दूरदर्शन में जो एक परिचर्चा रिकॉर्ड हो रही थी, उसमें इन्हें खास तौर पर बुलाया गया था।इनका एक खास परिचय और भी है, जिसे बताये जाने से वे हिचकती हैं और लोगों को मना भी करती हैं। वह यह कि ये देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की पोती हैं। एक अन्य समाजसेवी, स्वतंत्रता सेनानी ब्रजकिशोर प्रसाद की नतिनी हैं और जयप्रकाश नारायण इनके अपने मौसा लगते हैं। उन्होंने ही इनका कन्यादान किया था। इनका विवाह राष्ट्रपति भवन से 1962 में हुआ था। जाहिर है, बिहार की सबसे बड़ी महिला समाजसेविका प्रभावती देवी इनकी मौसी हैं।आज दो ढाई घंटे के लिये इनका सान्निध्य मिला। यह एक उपलब्धि की तरह था। इन्होंने चम्पारण,राजेंद्र बाबू, ब्रजकिशोर बाबू, प्रभावती और जेपी के बारे में ऐसी अमूल्य जानकारियां दीं जो कहीं और से मालूम नहीं हो सकता था। मगर एक खास बात जो उन्होंने कही वह मन में फ़ांस बन कर चुभी है। उसका उल्लेख कर देता हूँ। इस आग्रह के साथ कि कृपया इसे राजनीतिक मुद्दा न बनाएंगे।फ़ांस यह है कि दूसरे अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की संतानों की तरह इनके मन में भी कुछ मलाल है। इन्हें लगता है कि सरकारों ने राजेंद्र बाबू को इग्नोर किया। राजनीतिक वजहों से उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। दो बातों का खास तौर पर इन्हें दुःख है।
ये बातें उन्होंने इतने संकोच के साथ कही कि सचमुच मन भर आया। अगर सिर्फ चम्पारण सत्याग्रह की ही राजेंद्र बाबू की भूमिका को याद रखा जाये तो यह अपने आप में बहुत बड़ा योगदान है। अगर उनके समतुल्य राजनेताओं को सहज यह सम्मान मिलता रहा है तो यह कंजूसी राजेंद्र बाबू के मामले में ही क्यों। ऐसे ही अनुभवों से मन नेहरू-इंदिरा परिवार के प्रति खट्टा हो जाता है। इनलोगों ने अपने परिवार के अलावा कभी किसी की महत्ता को स्वीकार ही नहीं किया। लाचारी न होती तो गांधी का नाम भी कबाड़खाने में डाल दिया गया होता। खैर। फ़िज़ाओं में पहले से ही इतनी कटुता है। मैं इसमें और अधिक वृद्धि नहीं करना चाहता। मगर मोदी जी और नीतीश जी से जरूर अपेक्षा रखूंगा कि यह जो चूक हुई है। उसे ठीक किया जाये।ये पोस्ट पुष्य मित्रा के फेसबुक वाल से ली गयी है , सारी जानकारी उनके अनुभव पर आधारित है1. लोग राजेंद्र बाबू को संविधान निर्माण के उनके योगदान के मामले में समुचित क्रेडिट नहीं देते, जबकि वे संविधान सभा के अध्यक्ष थे। उन्होंने संविधान पर बने टीवी शोज और लिखे गए आलेखों का जिक्र करते हुए बताया कि उन्हें देखकर ऐसा लगता ही नहीं है कि राजेंद्र बाबू का संविधान सभा से कोई रिश्ता भी रहा होगा। सरकारों को उनके योगदान के बारे में नयी पीढ़ी को बताना चाहिये। मगर वह कई मौकों पर उन्हें भूल जाती है।
2. दूसरा यह कि देश के बड़े बड़े राजनेताओं की जयंती पर दिवसों का नाम रखा गया है। बाल दिवस, शौर्य दिवस, शिक्षक दिवस वगैरह। मगर इस मामले में भी राजेंद्र बाबू के योगदान का ख्याल नहीं रखा गया। कई दफा लोगों ने सरकारों को प्रस्ताव भेजा मगर सरकारों ने इन प्रस्तावों की अवहेलना कर दी। पिछले दिनों नीतीश कुमार ने घोषणा की थी कि राजेंद्र बाबू का जन्मदिन हमलोग मेधा दिवस के रूप में मनाना शुरू करेंगे। मगर वे खुद अपनी ही बात को भूल गये।
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