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Home » खबर » राजनैतिक चिंतन के बहाने ABKM के कंधे पर सवार सुबोध कान्त सहाय ने साधा अपना चुनावी अभियान, कायस्थ समाज उतरा विरोध में
ABKM5680 द्वारा जारी राजनैतिक चिंतन २०१९ का बैनर जिस पर विवाद है

राजनैतिक चिंतन के बहाने ABKM के कंधे पर सवार सुबोध कान्त सहाय ने साधा अपना चुनावी अभियान, कायस्थ समाज उतरा विरोध में

कायस्थ खबर डेस्क I अखिल भारतीय कायस्थ मह्सभा(सुबोध कान्त सहाय गुट ) के नव निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष  सुबोध कान्त सहाय ने लखनऊ ने एक राजनैतिक चिंतन बैठक के बहाने अपने राजनैतिक भविष्य की चाल चल दी I लखनऊ के गोमतीनगर के अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में आयोजित कार्यक्रम में सुबोधकांत सहाय ने कहा कि हमारी विरासत, इतिहास और उपलब्धियों का एक स्वर्णिम युग रहा है उसे फिर से पाना होगा। हम अपने पुरखों की प्रतिष्ठा को वापस पाने के लिये आदिवासी, दलित, शोषित, अति पिछड़ा, मस्लिम के साथ मिलकर गठजोड़ KADOM बनाने की दिशा में एक कार्ययोजना पर कार्य करेंगे। जिससे हम समाज में अपनी खोई ताकत को फिर से प्राप्त कर सकें। इसके साथ ही साल के अंत में एक बड़ा कार्यकर्ता सम्मलेन की घोषणा के साथ संकेत भी दे दिया की अखिल भारतीय कायस्थ महासभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद दरअसल उन्होंने सिर्फ अपने राजनैतिक चुनाव की नैया पार लगाने के लिए लिए लिया है I KADOM के विरोध में कायस्थ समाज में सुबोध कान्त के खिलाफ रोष  शाम आते आते जैसे ही सुबोध कान्त सहाय के इस ख़ास विचार KADOM की जानकारी कायस्थ समाज को हुई समाज के सुबोध कान्त सहाय को लेकर आक्रोश बाहर आना शुरू हो गया I लोगो को एक सामजिक संगठन में अन्य जातियों के साथ मिलना अपनी पहचान खोना जैसा लगा और इसके लिए सुबोधकांत सहाय को पूर्णतया दोषी माना अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के राष्ट्रीय स्वरुप २१५० के राष्ट्रीय अध्यक्ष  का दावा करने वाले  मनीष श्रीवास्तव ने आज फिर सुबोध कान्त सहाय के KADOM के विरोध में कहा  

इस सोसाइटी एक्ट की संस्था को शायद सुबोध बाबु एक राजनीतिक दल समझ लिए। सुबोध बाबु को इनके गृह प्रदेश ने इनके KADOM को नही पूछा तो अब देश मे किसी भी जगह में कायस्थ कैसे पूछेगे। हा कुछ छुटभैया सरीखे नेता जरूर इस KADOM को अच्छा कह सकते है। लेकिन हम नही। कायस्थ और हिंदुत्व का एक दूसरे से बड़ा ही सबंन्ध है। कायस्थ सन्गठन अभी चुपचाप समाजिक कार्य करे ।

फरीदाबाद के कायस्थ नेता प्रमोद श्रीवास्तव ने कहा 

आज एक नया स्लोगन सुनने को मिला "KADOM" अगर कायस्थ समाज को आगे बढ़ना है तो कायस्थ समाज ,दलित और मुस्लिम एक हो कर आगे बढ़ो कितनी शर्म की बात है क्या हमारे नौजवान दलित के साथ खड़े होकर आने वाले समय में आरक्षण  की भीख मांगेंगे ? ये मदरसे  में मुस्लिमों के साथ पढ़कर कटर वादी बनेगें? क्या यही सीख हम कायस्थ समाज के नौजवानों को दे रहें है।

कितनी शर्म की बात है। मैंने बड़े से बड़े आंदोलन अन्य समाज के द्वारा भी देखा जो अपनी सिर्फ समाज की बात करते हैं कि समाज कैसे आगे बड़े जैसे कि जाट समाज,गुजर समाज, पाटिल समाज, मराठा समाज इत्यादि ये लोग अपने समाज के नवजवानों को आपने समाज की रक्षा और गौरव की बात करते हैं। ना कि "KADOM" जैसे घटिया सोंच को थोपते हैं।

प्रमुख कायस्थ चिन्तक mbb सिन्हा ने कहा 

हम कायस्थ समाज मे वर्ण संकरता का विरोध करते हैं। विजातिए शादी से लेकर विजातिए सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन तक को कायस्थ स्मिता के खिलाफ हमारा आंदोलन चलता रहेगा। हमे राजनीतिक ताज नहीं, सामाजिक मर्यादा-प्रतिष्ठा का ताज चाहिए। ऐसा कायस्थ जिसका भाल विद्वता , शुचिता एवं संस्कार से हीरे जैसा दमके। भले हम मुट्ठी भर ही रहें।

वही पत्रकार अतुल श्रीवास्तव ने कहा 

पहले समाज मे बलि प्रथा थी जिसका बहुत विरोध हुआ काफी कुछ रोकथाम भी लगी... कुछ जगह छोड़कर.. KADOM काफी कुछ मुझे उसी बलि प्रथा जैसा प्रतीत हो रहा है बलि मे जिनकी बलि होती थी वो निरीह पशु पक्षी होते थे और इसमे बलि के लिए निरीह कायस्थों का सम्मान आन मर्यादा इज्जत सभी कुछ बलि चढ़ा देने का कुत्सित प्रयास लगता है... लेकिन ये गठबंधन जो स्वम के लालच की पूर्ति के लिए हो रहा है उसको स्वीकार नहीं करेगे... किसी को भी समाज की मर्यादा गिरवी रखने की इजाजत समाज नहीं देता अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए किए गए इस प्रयास की मै भर्त्सना करता हू... हम कोई भेड़ बकरी नहीं साहब जिधर ले चलोगे चल देगे..

कायस्थ खबर के प्रबंध सम्पादक आशु भटनागर ने कहा 

हाशिये  पर पड़े चद कायस्थ नेताओं का दिमागी फितूर है KADOM , आज ABKM के नाम पर जमा हुए जमावड़े में ये बात साफ़ दिखी ... जिनकी अपनी उपयोगिता सारी जगह समाप्त हो चुकी है और जो समर्थ और संगठित हिंदुत्व के विरोध के विरोधी है , जिनके नेता आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे रहे हो , जिन पर घोटालो के आरोप हो , जो साम्रदायिक सद्भाव के नाम पर धर्म द्र्हियो से मिल जाने को आतुर हो उनसे कायस्थ समाज कभी लाभ नहीं ले सकता है रामायण के कालनेमि सरीखे इस प्रपंची KADOM का विरोध कायस्थ समाज सर्वत्र करता है

ऐसे में सुबोध कान्त सहाय ने भले ही जल्दबाजी में अपनी बिसात तो बिछा दी है लेकिन समाज इस बिसात पर शह और मात के क्या खेल खेलगा वो वक्त ही बताएगा

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