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कायस्थ पाठशाला में न्यासियों की सदस्यता को लेकर बदलाव पर हो रहा हंगामा: आधार कार्ड और फोन नंबर से क्यूँ न हो सत्यापन?

अतुल श्रीवास्तव। कायस्थ पाठशाला एक बार फिर से चर्चा में है। कोर्ट से मिली हार के बाद डॉक्टर सुशील सिन्हा का गुट अब पूरी तरीके से हाशिये पर आ चुका है, जबकि कायस्थ पाठशाला की वर्तमान सत्ता संवैधानिक रूप से मजबूत होने के बाद ट्रस्ट को मजबूत करने और इसकी संरचना को दुरुस्त करने में जुट गई है।

जानकारी के अनुसार, डॉक्टर सुशील सिन्हा के कार्यकाल को शून्य घोषित कर दिया गया है। ऐसे में उनके द्वारा बनाए गए लगभग 5000 नए न्यासियों की सदस्यता भी खतरे में पड़ गई है। इस बीच, कायस्थ पाठशाला ने न्यासियों की सदस्यता सुनिश्चित करने के लिए रिन्युअल प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने का फैसला किया है।

पारदर्शिता की नई पहल

कायस्थ पाठशाला ट्रस्ट के अध्यक्ष राघवेंद्र सिंह के निर्देश पर महामंत्री एस डी कौटिल्य ने अब कायस्थ पाठशाला के सभी न्यासियों को प्रत्येक वर्ष अपने आधार कार्ड और फोन नंबर के साथ अपनी सदस्यता का रिन्यूअल करने को कहा है। पाठशाला के सूत्रों की माने तो, इस कदम से कायस्थ पाठशाला में चल रही मठाधीशों की उस ब्लैकमेलिंग पर लगाम लगेगी, जिसमें लोगों को चुनाव के समय यह पता ही नहीं होता था कि कौन सा न्यासी असली है और कौन सा फर्जी।

हर सदस्य का कर्त्तव्य है कि वर्ष में केवल दो बार होने वाली जनरल हाउस में प्रतिभाग कर अपना सुझाव दें,पर अफसोस है कि 200 का कोरम भी कभी कभी पूरा नहीं होता तो मीटिंग दस मिनट के लिए स्थगित करनी पड़ती है ताकि बैठक पूर्ण हो सके।
जब संस्था के कार्य में आपका सहयोग नहीं रहता है सदस्य रहने की क्या जरूरत है।विरोध करने वाले इसे स्पष्ट करें

एस डी कौटिल्य -महामंत्री कायस्थ पाठशाला ट्रस्ट

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ट्रस्ट की विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए महत्वपूर्ण है। इससे पहले भी कई बार कायस्थ पाठशाला में मृत हो चुके न्यासियों की स्क्रूटनी के लिए तमाम शिकायतें की जा चुकी हैं, किंतु पाठशाला प्रबंधन पर अक्सर इस बात को लेकर हीला-हवाली करने के आरोप लगते रहे हैं।

पुराने ढर्रे से नई व्यवस्था तक

पहले ट्रस्ट के चुनाव में लिफाफे या पोस्ट कार्ड लोगों के घर के पते पर इनरोलमेंट नंबर सहित आते थे, और लोग उस दिन पहुंचकर अपना वोट देते थे। तब इतने ठेकेदार नहीं थे, लेकिन अब हर जिले में कायस्थों के ठेकेदार पैदा हो गए हैं, जो मेंबर भी नहीं हैं। ऐसे में अब वर्तमान अध्यक्ष राघवेंद्र सिंह ने पाठशाला में पारदर्शिता लाते हुए इसे आधार कार्ड और फोन नंबर के साथ अपडेट करने का फैसला लिया है।

विरोध की कोशिशें नाकाम

इस फैसले से कायस्थ पाठशाला में हलचल मच गई है। कायस्थ पाठशाला के मठाधीशों ने शनिवार, 13 तारीख को इसके विरोध को लेकर एक कार्यक्रम करने की कोशिश की, लेकिन लोगों की कम उपस्थिति के कारण यह फिलहाल असफल होता दिखाई दे रहा है। कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे लोगों ने दावा किया कि वह न्यासियों के हित की लड़ाई लड़ रहे हैं और किसी भी कीमत पर इस नए नियम का विरोध करेंगे, जरूरत पड़ी तो आंदोलन तक करेंगे। हालांकि, सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलाने के बावजूद ये मठाधीश यह बताने में नाकाम रहे हैं कि आखिर न्यासियों का प्रत्येक वर्ष रिन्युअल अगर आधार कार्ड और फोन नंबर के साथ कराया जा रहा है तो इसमें समस्या क्या है?

विशेषज्ञ विश्लेषण: सत्ता की बहाली और राजनीतिक समीकरण

इस पूरे प्रकरण पर कायस्थ खबर के समूह संपादक आशु भटनागर ने कहा कि दरअसल, एक बार सत्ता की मलाई चख कर बाहर हो चुके लोगों की स्थिति 'शेर के मुंह खून लगने' वाली हो गई है। अब नए सिरे से 2029 में होने वाले अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए दावेदारों की राजनीतिक बिसात बिछाई जा रही है। जो भी लोग इस समय कायस्थ पाठशाला के ऐसे प्रयासों का विरोध कर रहे हैं, वह दरअसल पाठशाला की जगह अपनी मठाधीश को बचाने के अंतिम प्रयास में लग गए हैं।

सदस्यों की राय

वहीं, ट्रस्ट के एक सदस्य ने कहा, "मैं 1982 से जुड़ा हूं और करीब-करीब सभी ट्रस्ट के इलेक्शन में मैंने वोट किया है। मजे की बात यह है कि ठेकेदार वो बने घूमते हैं जो वोटर भी नहीं रहते हैं। क्योंकि मोस्टली पहले जो भी ट्रस्टी थे वो सब बिजी ही थे। हां, इस इलेक्शन के नाम पर कायस्थों का जमावड़ा हो जाता है, जिसका लाभ इलाहाबाद के कायस्थ नेताओं ने उठाया भी है। आम ट्रस्टी केवल 'के पी ट्रस्ट' संस्था जुड़ाव ही उसकी गरिमा है। लेकिन दुर्भाग्य तो तब चालू हो गया जब बिना ट्रस्टी बने कायस्थों के ठेकेदार बने टहल रहे हैं।"

एक अन्य सदस्य ने कहा, "समस्या विरोध का नहीं समस्या है लाभ हानि की हर व्यक्ति को सिर्फ ट्रस्ट के माध्यम से अपना ओर अपने लोगों (किसी भी जाति) का लाभ किसी न किसी तरह करना ही उद्देश्य है अगर यहां सिर्फ समाज के लिए सोचते तो शायद ऐसी गंदगी ही न पैदा होती अध्यक्ष कोई भी हो लेकिन जब तक सिर्फ समाज के लिए सोचेगा तो लोग हमेशा उनके साथ रहेंगे और अगर मात्र लाभ के लिए होगा तो फिर जो हुआ वही होगा बाकी समाज सेवा अन्य संस्थाएं बना कर भी किया जा सकता है लेकिन यहां सिर्फ ट्रस्ट के माध्यम से करने की बात करके लाखों करोड़ों खर्च करके सिर्फ उससे अधिक से अधिक लाभ पाने के लिए ही तरह तरह के मीटिंग करना सह भोज के नाम पर लोगो को इकठ्ठा करना ओर बंद कमरे में अपने लोगों को ये लाभ वो लाभ करके भीड़ इकठ्ठा करना ही समाज के नाम पर राजनीति करने वाले का तरीका बन गया जो समाज के लिए विनाश ही मात्र होगा"

वही एक संदस्य ने शून्य हो चुकी कार्यकारणी पर महाकुम्भ के दौरान वसूली के आरोप लगाते हुए कहा, "कि पूरे 3 months तक ट्रस्ट की सम्पत्ति से धन उगाही करते रहे इसलिए आज इतना दर्द हो रहा इनको, चोरी और धोखे से पायी हुई सत्ता ज्यादा दिन नहीं टिकती High Court और Supreme Court ने ये बता दिया है अभी भी समय है इन सभी के पास, मुन्शी जी से और समस्त न्यासीयौ से हाथ जोड़ कर क्षमा मांगे और पूरा धन Kayastha Pathshala के खाते में डाले, क्या पता मुन्शी जी इनको क्षमा कर दे !!"

कुल मिलाकर, कायस्थ पाठशाला में पारदर्शिता लाने की यह कवायद एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है। जहां एक ओर वर्तमान प्रबंधन ट्रस्ट को मजबूत करने में जुटा है, वहीं दूसरी ओर पुराने ढर्रे को बनाए रखने की कोशिश कर रहे तत्व अब हाशिये पर जाते दिख रहे हैं। आधार कार्ड और फोन नंबर के माध्यम से सदस्यता का सत्यापन न केवल फर्जी न्यासियों पर रोक लगाएगा, बल्कि आने वाले समय में होने वाले चुनावों को भी स्वच्छ और पारदर्शी बनाएगा जिसके लिए वर्तमान प्रबंधन को विरोध की जगह साधुवाद दिया जाना चाहिए।

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