
आपबीती : जब आपातकाल ने छीन ली मुझसे मेरी बहन – अशोक श्रीवास्तव
1975 के आपातकाल को मैं कभी नही भूल सकता। ये आपातकाल एक बार नहीं दो बार मुझ पर पहाड़ बन कर टूटा है। 1975 में और फिर 2004 -2005 में।
पहले बात 1975 की , मैं बहुत छोटा था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश मे इमरजेंसी लगाने का ऐलान किया। मुझे ठीक से याद नहीं पर एक दिन सुबह सो कर उठा तो कृष्णा नगर के घर पर पुलिस के सिपाहियों का पहरा देखा। पता चला कि रात करीब 3 बजे पिताजी को पकड़ने पुलिस आई थी। पिताजी पुलिस को गच्चा देकर भाग निकले थे। पर घर के सब लोग अब पुलिस की निगरानी में थे। उसके बाद साल डेढ़ साल पिताजी भूमिगत रह कर इमरजेंसी के खिलाफ लड़ते रहे। पिताजी फरार थे और घर पर फांके की नौबत थी। माँ जैसे तैसे पड़ोसियों से कभी चावल कभी आटा मांग कर हम बच्चों का पेट भरती थीं , कभी कभी आधा पेट ही खाकर हम सो जाया करते थे। माँ ने दूसरों के स्वेटर बुनना शुरू कर दिया था। थोड़ा बहुत कमाई हो जाती थी।
इस बीच एक दिन मेरी सबसे बड़ी बहन विजयलक्ष्मी दीदी स्टोव पर खाना बनाते हुई जल गई। पिताजी की गैरहाजरी में ही दीदी को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। दीदी बहुत ज़्यादा नहीं जली थीं, ऐसा कोई बड़ा खतरा नहीं था। पर उन्हें खून चढ़ाने की ज़रूरत थी। नहीं मालूम फिर क्या हुआ। एक दिन पता चला सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों को ये पता था कि पिताजी "वांटेड" हैं और फिर दीदी को न जाने कैसा खून चढ़ाया गया कि वो फिर कभी नहीं उठ पाईं और हमें हमेशा के लिए छोड़ कर चली गईं।
2004- 2005 में आपातकाल मुझ पर कैसे पहाड़ बन कर टूटा यह अगली पोस्ट में।अशोक श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार दूरदर्शन
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