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दिल्ली में माथुर नई सड़क वाले : अपने पुरखों के मोहल्लों-हवेलियों से नाता टूटता थोड़ी ही है। वह रिश्ता भगवान चित्रगुप्त मंदिर के जरिए बना हुआ है

सच में लॉकडाउन के कारण घरों में बंद दिल्ली के माथुर परिवारों का भी धैर्य जवाब देने लगा है। अब देखिए कि वे ना तो अपने रोशनपुरा के चित्रगुप्त मंदिर में जा पा रहे हैं और ना ही कालकाजी मंदिर या महरौली के योगमाया मंदिर में। नई सड़क से बस चंदेक मिनटों में आप रोशनपुरा के भगवान चित्रगुप्त मंदिर में पहुंच जाते हैं। इधर कायस्थों के आराध्य चित्रगुप्त जी की मूर्ति है। एक बडा सा शिवाला भी है। इन सब मंदिरों में माथुर परिवार बीच-बीच में आना पसंद करते हैं। ये इनकी पुरानी रिवायत है। हां, नई सड़क,किनारी बाजार, चहलपुरी, अनार की गली, चौक रायजी, चीराखाना,बीवी गौहर का कूचा वगैरह से बहुत सारे माथुर परिवार दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग एरिया में शिफ्ट कर गए हैं। आई.पी. एक्सटेशन की श्रीगणेश सोसायटी में दर्जनों माथुर परिवार रहते हैं। लेकिन अपने पुरखों के मोहल्लों-हवेलियों से नाता टूटता थोड़ी ही है। वह रिश्ता चित्रगुप्त मंदिर के जरिए बना हुआ है। पर इस सत्यानाशी कोरोना वायरस ने इन्हें अपने तीर्थस्थलों से ही दूर कर दिया है। कालकाजी मंदिर में साल में तीन बार दिल्ली के माथुर रसोई, फिर कढ़ाई और अंत में सावन की खीर के आयोजनों में मिलते हैं। ये सब सौ साल पुरानी परम्पराएं हैं। दिल्ली की माथुर बिरादरी की बात हो और पार्श्वगायक मुकेश और चीरखाना में जन्में गदर पार्टी के संस्थापक और अग्रणी क्रान्तिकारी लाला हरदयाल का का जिक्र ना हो, यह नहीं हो सकता। मुकेश का परिवार चहलपुरी में रहता था। वे मंदिर मार्ग के एमबी स्कूल में प़ढ़ते थे। वे बंबई जाने के भी बाद भी हर जन्माष्टमी पर दिल्ली में होते थे। यहां पर वे अपने इष्ट मित्रों के साथ नई सड़क में जन्माष्टमी पर लगने वाली झांकियों में जाकर भजन सुनाते थे। मुकेश के घर के बाहर कोई पत्थर वगैरह नहीं लगा हुआ ताकि उनके चाहने वाले कभी इधर आ सकें। लाला हरदयाल के नाम पर हरदयाल लाइब्रेयरी है। इस बीच, आपने देखा होगा कि एक छोटी सी सड़क हरीशचंद्र माथुर लेन मिलती है कस्तूरबा गांधी मार्ग से । पर इन माथुर साहब को अपने माथुर अपना नहीं मानते। वे तीसरी लोकसभा के राजस्थान से सदस्य थे। बहरहाल, पुरानी दिल्ली से बहुत सारे माथुर परिवारों ने निकलकर दरियागंज में भी अपने आशियाने बनाए। इधर के सी.डी माथुर और के.एल. माथुर 50 और 60 के दशकों में दिल्ली क्रिकेट के आतिशी बल्लेबाज हुआ करते थे। ये दोनों दरियागंज जिमखाना से खेलते थे। इन दोनों की वजह से ही हिन्दू कॉलेज दिल्ली यूनिवर्सिटी की क्रिकेट में सेंट स्टीफंस कॉलेज के अभेद किले में सेंध लगा सका। इसी तरह से दिल्ली किकेट को दशकों राम प्रकाश मेहरा उर्फ लाटू शाह के साथ एमबीएल माथुर चलाते रहे। गौर करें कि दिल्ली के बहुत से माथुर अपना सरनेम एंडले भी लगाते हैं। इसलिए आपको हर माथुर कुनबे में कुछ एंडले भी मिलेगे। वैसे माथुर और एंडले दिल्ली की अदालतों में छाए हुए हैं। वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ला का ये लेख नवभारत टाइम्स में।प्रकाशित हो चुका है

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