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कायस्थबोलता है : कलियुग मे श्री चित्रगुप्त भगवान के नाम की प्रत्यक्ष महिमा , प्रसिद संगीतकार चित्रगुप्त श्रीवास्तव

कायस्थ खबर "कायस्थ बोलता है" के नाम से  एक नया कालम शुरू कर रहा है जिसमे लोगो के टेस्टीमोनियलस उन लोगो के बारे में दिए जायेंगे जो परदे के पीछे रह कर काम कर रहे है I ये एक नयी कोशिश है समाज के चेहरों को आगे लाने का , मकसद है समाज में सहयोग की भावना को सामने लाने का I अगर आपके पास भी किसी ऐसे कायस्थ के बारे में कोई अच्छा अनुभव है तो  हमें ५०० शब्दों में ईमेल मेल करेंI

इस बार की कड़ी में हम लाये हैं  प्रसिद संगीतकार चित्रगुप्त श्रीवास्तव  के बारे जानकारी , जिसको सीवान से आदित्य श्रीवास्तव ने हमें भेजा है 

"राम से बडा राम का नाम" ये कहावत तो आप सबने सुनी ही होगी ?? सत्य भी है कि भगवान से बडा तो भगवान का नाम ही होता है। आज हम ऐसे ही एक महान कायस्थ का परिचय आप सभी को कराने जा रहे जिनके माता पिता की श्री चित्रगुप्त भगवान में इतनी ज्यादा आस्था थी कि उन्होने अपने बेटे का नाम ही चित्रगुप्त रख दिया। यही आस्था एक दिन रंग लाई और उसी बेटे नें संगीत जगत में एक इतिहास रच दिया। आप सब इसे इत्तिफाक मान सकते हैं पर मै इसे इस कलियुग मे भी श्री चित्रगुप्त भगवान की प्रत्यक्ष महिमा का ही नाम दुंगा।

चित्रगुप्त जी का पूरा नाम चित्रगुप्त श्रीवास्तव था। उनका जन्म 16 नवम्बर सन 1917 को बिहार के गोपालगंज जिले के कमरैनी गाँव के शिक्षित कायस्थ परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक एवं माध्यमिक शिक्षा-दीक्षा भी यहीं हुई, बाद में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए उन्होंने पटना विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और विषय अर्थशास्त्र से स्नाकोत्तर की डिग्री हासिल की।

अपने बड़े भाई जगमोहन आजाद, जो पेशे से पत्रकार थे और संगीत के बेहद शौकीन। चित्रगुप्त जी इन्हीं से ही प्रेरित होकर पटना मे ही विधिवत शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की। कुछ दिनों तक चित्रगुप्त जी पटना शहर के विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में कार्यरत रहे। पर इस पद में इन्हे संतोष नही हुआ। जिसके फलस्वरूप व्याख्याता का पद त्याग कर सन 1945 ई० में वे मुम्बई चले गए।

मुम्बई पहुचने के बाद चित्रगुप्त श्रीवास्तल जी को थोडी बहुत परेशानी हुई पर भगवान श्री चित्रगुप्त जी की कृपा से एक दिन एक अंजान व्यक्ति से मित्रता होती है और उसके माध्यम से संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी से मिलने जाते हैं जहां उनकी कला कौशल से ओत-प्रोत हो कर त्रिपाठी जी उन्हें अपना सहायक बनने का आमंत्रण दे डालते हैं। चित्रगुप्त जी इसे सहर्ष स्वीकार कर उनके साथ धुनों की यात्रा पर निकल पड़ते हैं।

वर्ष 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘तूफान क्वीन’ से चित्रगुप्त ने बतौर संगीतकार अपने फिल्मी कैरियर की शुरूआत की लेकिन फिल्म की विफलता से चित्रगुप्त जी अपनी पहचान बनाने में असफल रहे। अपने वजूद को तलाशने में चित्रगुप्त को फिल्म इंडस्ट्री में लगभग 10 वर्ष तक संघर्ष करना पड़ा। वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म सिंदबाद द सेलर चित्रगुप्त के फिल्मी कैरियर की सर्वप्रथम हिट फिल्म साबित हुई।

यहीं से चित्रगुप्त का फिल्मी सफर गति लेना शुरू कर दिया और चित्रगुप्त फिल्मों में बेजोड़ संगीत देने में व्यस्त हो गए। सुपरहिट हीरो, जादुई रतन, जय हिन्द, जोकर, शौकीन, भक्त पुंडलिक, भक्त पूरन, मनचला, शिवभक्त, जिन्दगी के मेले, नीलमणि, भाभी, चालबाज, काली टोपी लाल रुमाल, महाभारत, बागी, औलाद, परदेसी, इंसाफ की मंजिल, शिव गंगा जैसी सैकडो हिन्दी फिल्मों में आपने सफलता पूर्वक संगीत दिया।

चित्रगुप्त ने हिन्दी फिल्मों के अलावा भोजपुरी फिल्मों के लिये भी संगीत दिये हैं। वह भोजपुरी फिल्मों के प्रमुख संगीतकार माने जाते रहे। गांगा मइया तोहे पियरी चढ़इवो, लागी नाहीं छूटे रामा, गंगा किनारे मोरा गांव हो, पिया के गांव और गंगा जैसी फिल्मों के लिये अत्यंत सुरीले धुनों की रचना की। मोहम्मद रफी ने चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में ‘गंगा मइया तोरा पियरी चढ़इवो’ के लिये अत्यंत दर्दभरा गीत गाया है, ‘सोनवा के पिंजरा में बंद भइले हाय राम’। पिया के गांव का उनका गीत - ‘‘जुग-जुग जिये तू ललनवा’’ सुनकर पूरा ग्रामीण लोक जीवन सजीव हो उठता है।

भक्ति फिल्मो में भी चित्रगुप्त जी पीछे नही रहे। नवरात्र, नागपंचमी,अलीबाबा चालीस चोर, तुलसीदास, शिवरात्रि, सावित्री, किस्मत, लक्ष्मी पूजा जैसी तमाम भक्ति फिल्मों में चित्रगुप्त जी का चित्रगुप्ताना अंदाज लोगों के दिलों पर छाया रहा। और आखिरकार इनकी मेहनत और इनके माता पिता की भक्ति एक दिन रंग लाई और फिल्म की दुनिया में इन्हे युगपुरुष कहकर सम्बोधित किया गया।

चित्रगुप्त ने पंजाबी और गुजराती फिल्मों के लिये भी संगीत दिये।

पश्चिमी संगीत एवं संगीत में नये प्रयोग को लेकर मतभेद के कारण वह एस एन त्रिपाठी से अलग हो गये। उन्होंने फिल्म संगीत में लोक धुनों का इस्तेमाल करने के अलावा नये तरह के प्रयोग भी किये। फिल्म बरखा में हम मतवाले नौजवा, फिल्म ओपेरा हाउस के गीत देखो मौसम क्या बहार है में उनके नये प्रयोगों को देखा जा सकता है।

इन्ही के सुपुत्र दय आनंद मिलिंद भी आज संगीत के माध्यम से दुनिया में कायस्थ समाज का नाम रोशन कर रहे है, चित्रगुप्त के दोनों पुत्र 'आनंद चित्रगुप्त' और 'मिलिंद चित्रगुप्त' अपने शुरूआती दौर में संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के सहायक रहे। इसके अलावा अपने पिता के सहायक के तौर पर भी उन्होंने कई हिन्दी और भोजपुरी फिल्मों में संगीत दिया। उनकी पहली हिन्दी फ़िल्म "क़यामत से क़यामत तक " थी। इस फ़िल्म ने सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किए। उनकी दो बेटियां सुलक्षणा पंडित एवं विजेयता पंडित ने गायिका एवं अभिनेत्री के रूप में कई फिल्मों में काम किया।

चित्रगुप्त को उन्हें 1968 में दिल का दौरा पड़ा और 1917 में पक्षाघात का दौरा पड़ा। उनका निधन 14 जनवरी, 1991 को हो गया लेकिन उनकी मौत के इतने वर्ष बाद भी उनके अनेक गीत आज भी फिजां में गूंज रहे हैं जिनमें कई भोजपुरी गीतों के अलावा ‘‘तेरी दुनिया से दूर’’ (फिल्म जबक), ‘‘चल उड़ जो रे पंक्षी (फिल्म भाभी), ‘‘इतनी नाजुक ना बनो’’ (फिल्म वासना) ‘‘मचलती हुयी हवा में झमझम, हमारे संग-संग चले गंगा की लहरें’’ (फिल्म गंगा की लहरें) ‘‘मुझे दर्दे दिल का पता ना था’’ (फिल्म आकाशदीप), ‘‘दिल का दिया जला के गया’’ (फिल्म आकाशदीप), ‘‘दो दिल धड़क रहे हैं’’ (फिल्म इंसाफ), ‘जाग दिले दीवाना (उंचे लोग), रंग दिल की धड़कन भी (पतंग) आदि प्रमुख है।

ये तो रही एक भक्त की इसी कलिकाल की सच्ची कथा। और अंत में आप सभी से यही निवेदन करेंगे की भगवान श्री चित्रगुप्त जी स्वयं परमात्मा हैं, इनकी पूजा नियमित करें और लोगों से करने के लिये कहें। इस लेख को पढने के लिये आपने अपना कीमती समय दिया, इसलिये आप सभी को धन्यवाद कहते हुये सादर नमन _/\_

#जयश्रीचित्रगुप्त #जय_चित्रांश

प्रस्तुति : आदित्य श्रीवास्तव (सीवान)

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