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“कायस्थ समागम ” कायस्थ समाज आखिर क्यों संघेर्ष कर रहा है ? – आशु भटनागर

आज एक ग्रुप (जय चित्रांश आन्दोलन) मैं जोड़े जाने और उनके बताने पर की वो ३००० हो गये है मैं सोचने पर मजबूर हुआ की सोशल मीडिया के इस दौर मैं जब बाकी समाज अपनी सामजिक स्थिति को इतना प्रभावशाली बनाए हुए है तो कायस्थ समाज आखिर क्यों संघेर्ष कर रहा है ? मित्रो कोई भी समाज तरक्की तभी करता है जब उसके समर्ध लोग समाज मैं अपना कर्तव्य निभाये , उसको जाग्रत करना शुरू करे , अपने गरीब भाइयो को मदद करके उन्हें अपने साथ ला सके , मगर दुर्भाग्य से कायस्थों मैं ऐसा नहीं है I हम अक्सर अपने आपको गैर राजनातिक और गैर व्यापारिक बता कर अपने नैतिक कर्तव्यों से हाथ खींच लेते है कायस्थों को राजनीती और व्यापार मैं भी पूरा सोचना चाह्यी , गैरराजनातिक होने के चक्कर मैं हमारे संघठन तो २०००० से ज्यदा हो गये मगर वो कभी प्रभावशाली नहीं हो पाए , आज दुर्भाग्य ही है की जिस समाज मैं इतने संघठन हो मगर उनमे से १०% भी ना चल पाते हो तो इसका मूल कारण ये रहा है की अधिकतर संघठन नौकरी से रिटायर्ड कर्मचारियो ने बनाए है , जिसके चलते उनके आपस के अहम और अहंकार इन पर हावी रहे , फलस्वरूप ये संघठन कभी चाय पानी के स्तर से कभी उपर नहीं उठ सके I काम तो खैर होने ही नहीं थे क्योंकि रिटायर कर्मचारी अपना PF/पेंशन निकलवाने मैं इनका उपयोग ज्यदा करता रहा , समाज मैं क्या हो उसकी फिकर कम I अगर आप दलित , ब्राह्मण, वैश्य समाज या मारवाणी समाज की तुलना मैं कायस्थों को देखे तो हम अभी भी सामाजिक शक्ति को साबित करने मैं सबसे पीछे है मेरी समझ मैं इसका सबसे बड़ा कारण है कायस्थों का अपने समाज को लेकर हीन भावना I उनमे खुद को कायस्थ कहने मैं शर्म का होना , अपने ही समाज के लिए कुछ करने से बचना I मेरी जानकारी मैं आज भारत मैं कम से कम १००० कायस्थ बड़े व्यापारी है जिनका टर्नओवर ५० करोर सालाना से ज्यदा है मगर उनमे से सिर्फ ५ या १० ही ऐसे है जो समाज के लिए खुले तोर पर आगे आये है SIS के  चेयरमैन श्री आर के सिन्हा का नाम उनमे से एक है , नॉएडा के श्री राजन श्रीवास्तव भी इसमें आते है मगर इन दो नामो के बाद मुझे कहते हुए अफ़सोस ही होता है की हमारे यहाँ कोई समर्ध कायस्थ आपको सामजिक कार्यो मैं अपना सहयोग देता नजर नहीं आता I हाँ कायस्थ मंचो पर सबको स्थान चाह्यी , सबको सम्मान चाह्यी और इन्हें कायस्थ संगठनो से शिकायत भी बहुत है की वो इन्हें पूछते नहीं चित्रांश बंधुओ अगर आप सच मैं चाहते है की आपको यथासंभव सामान और स्थान वापस मिले तो हम सबको सामूहिक प्रयत्न करने होंगे , आगे बढ़ कर सामाजिक कार्यो मैं भाग लेने होंगे , अपने प्रतिष्ठानों को बताना होगा की हाँ ये कायस्थों के है I आप कभी बनिया समाज के शादी के कार्ड देख्नेगे तो पायेंगे की वो अपने प्रतिष्ठान जरुर लिखते है , मगर हम तो अपने प्रतिष्ठानों मैं कहते हुए भी डरते है की ये कायस्थ के है हमें सरदारों से समझना होगा की सामाजिकता कैसे होती है वो व्यापार करते है मगर उसके नाम से लंगर चलाने मैं परहेज नहीं करते इसलिए वो सिर्फ 2% होने पर भी कामयाब है और हम जो देश मैं सर्वाधिक साक्षर होने का दावा रखते है सामाजिक तोर पर दीन-हीन है मैं चाहता हूँ की मेरी लिस्ट मैं इन 2 नामो के बाद २०००० हजार नाम हो और सबसे बड़ी बात उन नामो मैं प्रतिस्पर्धा हो की मैं समाज को इतना और दूंगा मेरा नाम सबसे उपर आये , जिस दिन ये हो गया उस दिन कायस्थ समाज को सामाजिक ताकत बन्ने से कोई नहीं रोक सकता आशु भटनागर 

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