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एक शास्त्री जी एक मोदी : एक भाव ना जाने , एक भाव ना माने – आशु भटनागर

इस 2 अक्तूबर को एक अजीब घटना हुई , पिछले ५० सालो मे पहली बार कोई प्रधानमन्त्री देश के सबसे ईमानदार पूर्व प्रधानमन्त्री स्व लाल बहादुर शास्त्री जी की समाधि पर अपने श्रधा सुमन अर्पित करने नहीं गये I प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा क्यूँ किया इसका कोई स्पष्टीकरण ना तो पीएमओ और ना ही उनकी पार्टी की तरफ से ही आया है
राजनैतिक तोर पर इसका विरोध कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने प्रतीकात्मक तोर पर करना था और उन्होंने कर भी दिया I परिवार की तरफ से भी थोडा बहुत विरोध दिखाई दिया मगर ऐसा कुछ नहीं दिखा जिससे ये समझा जा सके की वाकई कुछ ऐसा हुआ जिस पर प्रधानमन्त्री नरेंद्रमोदी को खेद प्रकट करना पड़े I शायद आज के बदलते राजनैतिक दौर मे ये सब बेमानी है या फिर शायद मोदी आज इतने बड़े ब्रांड हैं की उन्हें पूछे कौन ?
रहा सवाल सामाजिक दबाब का तो कायस्थ समाज वैसे भी कभी इस हालत मे रहा ही नहीं की वो अपने हक़ या सामान की मांग भी रख सके I एक नौकरी पेशा समाज कितना दब्बू और दंडवत होता है वो हम इस समाज की ऐसी घटनाओं पर संवादहीन प्रतिक्रिया को देख कर समझ सकते है I खैर लेकिन इस घटना ने राजनैतिक तोर पर लगभग तोर पर अछूत इस समाज की हालात बयां कर दिए है I देखा जाए तो शास्त्री जी को आम जनता ने भले ही उनके आदर्शो और विराट व्यक्तित्व के चलते भले दिलो मे बसाया हो और अपने बच्चो के प्रेरणास्रोत बनाया हो , मगर राजनीती ने उनके साथ कभी न्याय नहीं किया I एक बेहद गरीब परिवार से आये लाल बहादुर शास्त्री ने अपने मेहनत , इमानदारी के बल पर प्रधानमन्त्री पद तक की यात्रा जरुर की मगर राजनातिक सम्मान उन्हें इस देश की सामंत व्यवस्था ना दे सकी जिसके वो हकदार थे I इतिहास को आज फिर से कुरेदने की चाह तो नहीं मगर नेहरु जी की म्रत्यु के बाद चाहे वो इंदिरा गांधी का उनको प्रधानमन्त्री आवास की जगह अन्य बंगला लेने को लिखे पत्र की बात रही हो या फिर अपने ही पार्टी मे उनके पद को लेकर बिभिन्न प्रतिक्रियाये I सच यही था की हमेशा राजा के आगे सर झुकाने वाले लोग ६५ की लड़ाई तक उनको अपना नेता नहीं मान सके I मगर विपरीत परिस्थतियो से हमेशा लड़ने वाले इस योधा ने ६५ के युद्ध मे पाकिस्तान को हरा कर सबके मुह तो बंद किये , मगर राजनीती की सोच नहीं बदल सके I देखा जाए तो नायकत्व की दौड़ मे सक्षम उत्तराधिकारी ही नायक का सम्मान बचा कर रख पाता है , नरेद्र मोदी भी २०२४ तक इस देश के ह्रदय से हटने वाले नहीं नहीं है , मगर वो खुद भी शास्त्री जी की लाइन मे है इस बात का एहसास शायद उन्हें नहीं है I शास्त्री जी की तरह मोदी खुद भी एक बेहद सामान्य परिवार से आते है और बिषम परिस्थतियो मे ही उनको भी देश को संभालने का मौका मिला है I लेकिन आज अगर नरेंद्र मोदी ने भी इंदिरा गांधी की तरह शास्त्री जी को इग्नोर किया तो उसका कारण यही दीखता है की नरेंद्र मोदी भी शायद इस सादगी की प्रतिमूर्ति को नायक नहीं मान सके I उससे भी दुखद ये है की नरेंद्र मोदी ने जो नजीर उनके लिए पेश की है देर सवेर वो आगे जाकर उनके साथ भी ना हो इसकी संभावना भी कम नहीं है I आशु भटनागर 

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