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कायस्थों का ऐतिहासिक विरोध, नही चाहिए जातिगत आरक्षण की पौध : अनिल कुमार श्रीवास्तव

अनिल कुमार श्रीवास्तव : 11 अगस्त 2021, दोनों सदनों से आरक्षण सम्बंधी 127 वें संविधान संसोधन बिल पास होने के बाद प्रदेश सरकारों को मिले अधिकार के तहत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 39 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल किए जाने की तैयारियों के बीच हिन्दू कायस्थों ने आज भी इस संसोधन का विरोध जारी रखा। आजादी से अब तक पहली ऐसी जाति कायस्थ उभर कर सामने आई है जिसने आरक्षण लेने से न सिर्फ इनकार किया बल्कि जातिगत आरक्षण को समाप्त कर आरक्षण का आधार आर्थिक, शारीरिक अक्षमता किये जाने की वकालत की।
हालांकि गत दिवस से अब तक शोषल मीडिया पर इस संसोधन से बढ़ी गतिविधियों में कुछ कायस्थ इस संसोधन के पक्ष में भी नजर आए और कई जगह चर्चाएं सियासी रुख लेती भी नजर आयीं लेकिन आज भी तमाम कायस्थ अपनी बात पर अड़े रहे और उन्होंने जातिगत आरक्षण का लॉलीपॉप लेने के बजाय इसे आर्थिक, शारीरिक अक्षमता के आधार पर किये जाने और प्रतिभा प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिये जाने की बात की।
विधेयक पास होने के साथ राज्यों को मिले अधिकार के बाद उत्तर प्रदेश ने कायस्थ, वैश्य समेत 39 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की तैयारी कर ली। यह खबर समाचार सेवाओ में आने के बाद बाकी 38 जातियों में जहां पिछड़ा वर्ग में शामिल किए जाने से खुशी का माहौल दिखा वहीं इस अप्रत्याशित खबर से हिन्दू कायस्थ समाज में नाराजगी का माहौल रहा। विभिन्न कायस्थ संगठन, समूहों व सेवियो में अपने गौरवशाली इतिहास व वास्तव में जरूरी लोगो तक आरक्षण न पहुंच पाने का कोफ्त दिखा। पिछड़ा वर्ग में शामिल किए जाने का विरोध कर रहे कायस्थों के मुताबिक आरक्षण का आधार जाति होना ही नही चाहिए बल्कि आरक्षण का आधार तो गरीबी होना चाहिए व लाचारी होना चाहिए। वास्तव में आरक्षण के हकदार तो वो हैं जो शारीरिक रूप से अक्षम हो चुके हैं या गरीबी से टूट चुके हैं। और गरीबी, लाचारी जाति देखकर नही आती। आरक्षण के इतिहास में अब तक कायस्थ ऐसी जाति निकली जिसने इसे ठुकरा कर जरूरत के लोगो की हिमायत की हो। इसके अलावा कायस्थ समाज का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। एक समय था जब आधे भारत पर कायस्थ का शासन था। एक समय था जब राजस्व व अन्य लेखन क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान रहे। कायस्थों ने शासन संचालन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एकमात्र जीवित भगवान चित्रगुप्त ने तो जब से सृष्टि की रचना हुई और जब तक सृष्टि रहेगी तब तक सभी जीवधारियों के लेखा जोखा का दायित्व निभाया, निभा रहे और निभाते रहेंगे। कलम के देवता भगवान चित्रगुप्त सारी कायनात के न्यायाधीश भी हैं। उन्ही चित्रगुप्त भगवान के वंशज हैं यह कायस्थ। हालांकि वर्तमान दौर में इनकी हालत धीरे धीरे खराब होती जा रही है। लेकिन यह विरोध इनके स्वाभिमान का परिचायक है। कायस्थों का मानना है कि योग्यता को दीमक की तरह चाटता है यह आरक्षण।
कुछ कायस्थ इस संसोधन के पक्ष में भी खड़े नजर आए। उनका मानना है कि वर्तमान दौर में आरक्षण ही सफलता की कुंजी है। कुछ तो राजनीति से प्रेरित होकर इसके पक्ष में दिखे।कुलमिलाकर कर कायस्थ समाज मे इस आरक्षण सम्बन्धी वर्ग संसोधन से विशेष हलचल दिख रही है। अब तक एकमात्र जाति कायस्थ ही इस आरक्षण मलाई को लेने से इनकार करता भी नजर आया है। हालांकि इस आरक्षण लॉलीपॉप को कुछ और वर्ग लेने के प्रयास में दिख रहे हैं। चुनाव से पहले छेड़ा गया यह आरक्षण संसोधन क्या गुल खिलायेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन एकमात्र कायस्थ समाज के तमाम लोग अपना यह अप्रत्याशित पिछड़ापन पचा नही पा रहे हैं।

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