Check the settings
Templates by BIGtheme NET
Home » चौपाल » कायस्थ से कायस्थ तक : क्या हमारा कायस्थ समाज कोई सबक ले सकेगा ? -महथा ब्रज भूषण सिन्हा.

कायस्थ से कायस्थ तक : क्या हमारा कायस्थ समाज कोई सबक ले सकेगा ? -महथा ब्रज भूषण सिन्हा.

दुर्गा पूजा समाप्त हो गई. इस बीच लोकनायक जय प्रकाश नारायण की पुण्य तिथि 8 अक्टूबर एवं जयंती 11 अक्टूबर, दोनों बीत गए. पूजा के धूम-धडाके में लोकनायक को याद करने की फुर्सत शायद अधिकतर कायस्थ बंधुओं को नहीं मिली होगी. कायस्थ समाज में बाहरी दिखावा का एक जबरदस्त डी एन ए रहा है. जिनके पास धन रहा वे दिखावा में लुटा दिए और जिनके पास नहीं रहा वे कर्ज लेकर दिखावा करने में अव्वल रहे हैं. पर अपने समाज के उत्थान के लिए ना धन से ना मन से और ना ही तन से कभी उदार रहे. और जिनके पास कुछ भी न रहा तो बातों की शेर पर सवारी करते मिलेंगे. यानी हर हाल में हम दिखावा पहला कर्तव्य की तरह निभाते आ रहे हैं. एक दूसरा डी एन ए यह है कि अपने समाज के महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के साथ अपने को जोड़ लेना कायस्थ का यह नैसर्गिक गुण है. हम महत्वपूर्ण व्यक्तियों के रिश्तेदार हो जाते हैं. और अपने ही समाज के दुसरे लोग पर धौंस जमाने लगते हैं. दूसरा भाई तीसरे के ऊपर और तीसरा चौथे के ऊपर धौंस जमाने का क्रम जारी रखता है. पर समाज के बाहर हमारा कोई जोर नहीं चलता और वहां हम भीगी बिल्ली बन जाते हैं.हमने जब जब ऐसा किया है, अपने महापुरुषों का सम्मान घटाया है. विश्व अथवा देश के सिरमौर रहे हम अपने भाई को जाति के जंजीरों से ऐसा जकडते हैं कि वे ख़ास से आम हो जाते है. सबसे पहले हमने अपने पूर्वज एवं भगवान् श्री चित्रगुप्त जी को सृष्टि के भगवान से खींचकर खानदानी भगवान बना डाला है और जातिगत जंजीरों में इस कदर जकड़ दिया है कि वे खानदानी भगवान् ही बन कर रह गए. फिर हमारी नजरें स्वामी विवेकानंद, महर्षि महेश योगी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, लोकनायक जय प्रकाश नारायण जैसे विश्व स्तरीय नेताओं पर पड़ी और उन्हें भी समाज में कैद कर दिया. फलस्वरूप उनका सम्मान जनमानस के दिलों में घटता चला गया. हमारा अपने आदर्श पुरुषों पर गर्व करना सिर्फ खानापूर्ति करने के सिवाय कुछ भी नहीं होता. न तो हम उनके जीवनी से कुछ ले पाते हैं और न ही हम उन्हें मर्यादित करते हैं. यहाँ तक कि इनके जयंती या पुण्य तिथि के अवसरों पर भी हम उन्हें श्रद्धा के दो फूल भी नहीं दे पाते. इस अवसर पर भी हमारी उपस्थिति पांच से पचास तक में ही सिमट जाती है. कायस्थ संगठन के 129 वर्ष के इतिहास में हमने आज तक ऐसी कोई प्रणाली नहीं बनायी जो व्यापक रूप से हमारे इन विभूतियों का ख्याल रखे. और न ही इतने दिनों में हमारे मन में अपने समाज के प्रति यह भावना ही जाग्रत हो सकी कि हम अपने कुल एवं वंश पर गर्व करना अपने दिनचर्या में ढालें. दूसरी ओर शासन एवं समाज ने हमारी स्वार्थपरता और निष्क्रियता देख कर हमारी विभूतियों को नकार दिया है. कभी इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में छाये रहनेवाले हमारे महापुरुष अब दो सेकंड एवं दो लाइन के भी मुहताज हो गए हैं. हाल के दिनों में सरकारे भी हमारे महापुरुषों को कोई मान नहीं दे रही और न ही हम ऐसी स्थितियों पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त कर पाते हैं. हमारी निष्क्रियता ने हमारे अपने महापुरुषों की छवि को गंभीर और गहरा आघात पहुंचाया है. अभी व्हाट्स एप्प पर एक मेसेज देखा कि दिल्ली के लोकनायक जय प्रकाश नारायण की मूर्ती पक्षियों के बीट से भरी हुई थी, जहाँ श्री आरके सिन्हा जी ने माल्यार्पण की रस्मअदायगी की. हमारे सभी महापुरुषों के प्रतिमाओं के भी यही हाल है. हमारे समाज में आज भी राजनितिक और सामाजिक नेताओं की कोई कमी नहीं है. और न ही आज के दौर में साधन की कमी है, जिससे हम इन महापुरुषों की गौरव की रक्षा न कर पायें. अगर कुछ नहीं है तो वह है “बोध” जो हममे नहीं है. दिल्ली जैसे शहर में कायस्थ राज नेताओं एवं सामाजिक नेताओं की कोई कमी नहीं है, जो इस अवसर पर अपना सम्मान प्रकट कर सकते थे. मगर जैसा कि हमने ऊपर कहा “बोधभाव” नहीं है. अगर कायस्थ समाज के संगठन सिर्फ इन स्मारकों के रख-रखाव का ही काम करते तो भी एक सामाजिक सेवा होती. आखिर कायस्थ समाज को हो क्या गया है ? कौन कायस्थ समाज की इस बिगड़ती स्थिति का जिम्मेवार है? महिमा मंडन का तांडव सीमापार कर चुकी है. हर संगठन एवं व्यक्ति का यही दावा है कि वे ही कायस्थ समाज के नियंता हैं. अपनी उपलब्धियां, जो वास्तव में हैं नहीं, का बखान में न जाने कितने तारे तोड़ डालते हैं. जाहिर है सामाजिक कार्य की परिभाषा अब बदल चुकी है. इस तरह के कार्य में वर्तमान किसी भी संस्था एवं व्यक्ति की रूचि नहीं है. सभीलोग पद की लड़ाई, सिर्फ राजनितिक ताकत कहलाने एवं निजी स्वार्थ के दिवास्वप्न में ही व्यस्त हैं. जो सही रणनीति, दूरदृष्टि, योजनाबद्ध कार्य एवं नीतियों के अभाव में किसी के पल्ले नहीं पड रही. पंद्रह दिनों के बाद श्री चित्रगुप्त पूजा है. इस अवसर पर जगह-जगह चित्रगुप्त पूजन के आयोजन होंगे पर सजावट एवं लजीज खान-पान तक सिमित रह समाज को क्या सन्देश देते रहे हैं या देंने वाले हैं? अगर इस बार कायस्थ समाज, भगवान् श्री चित्रगुप्त को कलम कार्य में संलग्न सभी जाति के लोगों में प्रतिष्ठित कराए तो कम से कम एक कदम तो आगे बढ़ेंगे ही. चलते-चलते: 15-16 अक्टूबर को सारे वैश्य समुदाय का सम्मलेन होने जा रहा है जिसके आयोजक डॉ सुभाष चन्द्रा हैं एवं विशिष्ठ अतिथि श्री अमित शाह जो सभी वैश्य उपजातियों को एक मंच एवं एक संगठन देने का प्रयास कर रहे हैं. क्या हमारा कायस्थ समाज इससे कोई सबक ले सकेगा? -महथा ब्रज भूषण सिन्हा.

आप की राय

आप की राय

About कायस्थ खबर

कायस्थ खबर(http://kayasthakhabar.com) एक प्रयास है कायस्थ समाज की सभी छोटी से छोटी उपलब्धियो , परेशानिओ को एक मंच देने का ताकि सभी लोग इनसे परिचित हो सके I इसमें आप सभी हमारे साथ जुड़ सकते है , अपनी रचनाये , खबरे , कहानियां , इतिहास से जुडी बातें हमे हमारे मेल ID kayasthakhabar@gmail.com पर भेज सकते है या फिर हमे 7011230466 पर काल कर सकते है अगर आपको लगता है की कायस्थ खबर समाज हित में कार्य कर रहा है तो  इसे चलाने व् कारपोरेट दबाब और राजनीती से मुक्त रखने हेतु अपना छोटा सा सहयोग 9654531723 पर PAYTM करें I आशु भटनागर प्रबंध सम्पादक कायस्थ खबर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*