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श्रद्धांजलि : १८जनवरी, हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव “हरीश जी” की पुण्यतिथि पर विशेष – सौरभ श्रीवास्तव

स्व. पिताश्री श्री हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव "हरीश जी" का जन्म महाशिवरात्रि के दिन 1925 में हुआ था। दिनांक 18 जनवरी 2015 त्रयोदशी (प्रदोष) को प्रातःकाल 90 वर्ष की आयु में स्व. पिताश्री ने देह त्यागी थी। किन्तु हमारे ह्रदय में उनका सदैव वास रहेगा। उनके सामाजिक जीवन की यात्रा मात्र 14 वर्ष की छोटी उम्र में सन 1939 में प्रारम्भ हुई। जब पूजनीय नानाजी देशमुख जी ने उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़ा। जमींदारी का विलासपूर्ण जीवन तज पिताजी ने साइकिल उठाई और संघवृक्ष को पल्लवित करने काँटों भरे मार्ग पर निकल पड़े। पूजनीय नानाजी को अपनी साइकिल पर बिठा उन्होंने पूरे पूर्वी उत्तर-प्रदेश को नाप दिया। इस क्षेत्र में संघ की जड़े जमाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था। 1956 में उन्हें नानाजी के आदेश पर ही भारतीय जनसंघ में भेज दिया गया। यहाँ से पिताजी की राजनैतिक यात्रा प्रारम्भ हुई। 1975 में कांग्रेस सरकार द्वारा आपातकाल लगाया गया। माननीय नाना जी के निर्देश पर पिताजी भूमिगत हो गए। उन्होंने कहा था, "हरीश, गिरफ्तार मत होना और काम करते रहना। गिरफ्त में आ चुके कार्यकर्ताओं के परिवारों का ध्यान रखना।" उस समय संघ द्वारा संचालित जयप्रकाश जी के आन्दोलन के उप्र में संचालन का दायित्व पिताजी पर था। पिताजी पूरे दिन कहीं छिप कर रहते और रात्रि में कार्यकर्ता परिवारों के जीवन-यापन की चिन्ता करते। उन्हें पकड़ने के लिए उप्र पुलिस ने लाखों जतन किये, परंतु असफल रही। बौखला कर प्रशाशन ने हमारे आवास की कुर्की कर दी। पूर्वसूचना के आधार पर माँ ने उपयोगी वस्तुएं हटा दी थीं। माँ, बुआ, 3.5 वर्ष की दीदी और 15 दिन का मैं था। कुर्की में घर में पुलिस ने एक तिनका भी नही छोड़ा था। तंग आकर माँ घर छोड़कर गोरखपुर चली गयी थीं। आपातकाल समाप्त होने पर 1977 में हुए आम चुनाव में पिताजी स्व. माधव बाबू के निर्देश पर बांसी विधानसभा से चुनाव लड़े और जीत कर प्रदेश सरकार में खाद्य एवं रसद आपूर्ति तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के कैबिनेट मन्त्री का दायित्व निभाया। उस दौरान उन्होंने जमाखोरों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की। छापेमारी का नेतृत्व कर गोदामों में छिपाकर रखे गए अनाज को बाजार में ला दिया। फलस्वरूप सभी प्रकार के अनाज आदि का मूल्य गिर गया और जनता को भारी राहत मिली। 1991 में भाजपा के प्रदेश महामन्त्री (संगठन) के तौर पर पिताजी ने श्री कल्याण सिंह जी के नेतृत्व में सरकार बनाने में अपनी भूमिका का सफल निर्वहन किया। इसी दौरान माननीय संघ प्रमुख भाऊराव जी देवरस के निर्देश पर मेरी माँ डॉ ज्योत्सना श्रीवास्तव जी ने 1991 में वाराणसी कैन्ट से चुनाव लड़ा और विजयश्री प्राप्त की। सन 1967 के बाद सीधे 1991 में कैंट में भाजपा विजयी हुई। उस समय वाराणसी पर कम्युनिस्टों का कब्ज़ा था। यहाँ का नारा था, "ललका झंडा, मोटका डंडा।" स्व. ऊदल जी 8 बार, श्री शतरुद्र प्रकाश 4 बार विधानसभा चुनाव जीत चुके थे तथा 1991 में वह कारागार मंत्री भी थे। तुलसीपुर में विकास प्राधिकरण ने भूमि अधिग्रहण की योजना बनाई। माँ ने भारी आन्दोलन करके चार वार्डो के जमीन पर सरकारी कब्ज़ा नही होने दिया, इसके सिवा शहरी सिलिंग योजना तथा पुलिस-प्रशासन के अनैतिक कार्यों के विरुद्ध माँ सदैव आंदोलनरत रहीं। फलस्वरूप इस क्षेत्र में भाजपा मजबूत हुई। 1993 में पुनः माँ इसी सीट से विधायक चुनी गईं। 1996 में माँ, आदरणीय कुशाभाऊ ठाकरे जी की टीम में भाजपा के राष्ट्रीय सचिव के दायित्व पर थीं। पार्टी के निर्देश पर पिताजी वाराणसी कैन्ट से चुनाव लड़े और माननीय कल्याण सिंह जी की सरकार में समाज कल्याण मन्त्री का दायित्व निभाया। समाज कल्याण विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए उन्होंने पहले कैम्प लगाकर राशि का वितरण, बाद में चेक द्वारा वितरण प्रारम्भ कराया। स्व. रामप्रकाश गुप्ता जी ने मुख्यमंत्री बनते ही पिताजी को वित्तमन्त्री का दायित्व दिया। माननीय राजनाथ जी की सरकार में पिताजी ने पुनः प्रदेश के वित्तमन्त्री का दायित्व निभाया। पिताजी ने अपने कार्यकाल में प्रदेश का ऋण घटाया और आय बढ़ाई। उनका पूरा जोर प्रदेश को अपने पैरों पर खड़ा करने पर रहा। पिताजी 2007 तक विधायक रहे। 82 वर्ष की अवस्था में उन्होंने निर्णय लिया कि अब वह चुनाव नहीं लड़ेंगे और कार्यकर्ता के तौर पर पार्टी के बैनर तले जनता की सेवा करते रहेंगे। उनका 76 वर्षों का निष्कलंक सामाजिक-राजनैतिक जीवन हम सभी के लिए अत्यन्त प्रेरणादायी है। उन्होंने मुझे 5 वर्ष की आयु में अंगुलि पकड़ कर संघ की शाखा में पंहुचाया था। मैंने मुख्यशिक्षक, शाखा कार्यवाह एवं नगर सायं कार्यवाह का दायित्व निभाया। फिर भाजयुमो, भाजपा व्यापार प्रकोष्ठ और अभी भाजपा के वाराणसी महानगर उपाध्यक्ष का दायित्व निभा रहा हूँ। श्री रामजन्म भूमि आन्दोलन के दौरान पिताजी गाजीपुर जेल में निरुद्ध थे। माँ के निर्देश पर मैंने अपनी शाखा के स्वयंसेवकों के साथ कर्फ्यू का उल्लंघन किया। हम सभी 12 वर्ष से 17 वर्ष आयु के स्वयंसेवक रामधुन गाते ढोल-मजीरा बजाते हुए आन्दोलन के समर्थन में जुलूस निकाले। प्रदेश की आततायी सरकार के निर्देश पर पुलिस ने हम बाल स्वयंसेवकों पर लाठीचार्ज किया। मेरे पूरे तन पर लाठियों के 42 चिन्ह थे। सिर्फ सर बचा था। सड़क पार करना, दो पहिया वाहन चलाना, चार पहिया वाहन चलाना, सभी कुछ पिताजी ने ही मुझे सिखाया और राजनीति के माध्यम से समाजसेवा का पाठ भी मैंने उन्हीं से सीखा। देह त्यागने से एक दिन पूर्व 17 जनवरी की रात 10 बजे मैं उनके बगल में बैठकर भोजन कर रहा था। उन्होंने उस दिन भी मुझे स्मरण कराया कि बाँटने हेतु लाये गए कम्बल बचे हुए हैं। उनके निर्देश पर मैं रात 11 बजे कम्बल बाँटने निकला और 1 बजे लौटा। 3 बजे उनकी तबियत बिगड़ी। 18 जनवरी की सुबह 5 बजे वह हमें छोड़ गए। उनकी इच्छानुसार प्रातः 6 बजे डॉ सुनील साह जी ने उनका नेत्रदान कराया। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मेरी परम पिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि मुझे जीवनपर्यन्त पिताजी के दिखाये सत्यनिष्ठ मार्ग पर चलकर जनता की सेवा करते रहने के लिए शक्ति प्रदान करें। अभिवादन सहित, सौरभ श्रीवास्तव उपाध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी वाराणसी महानगर

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