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चौधरी जितेन्द्र नाथ सिंह के समर्थक राहुल निरखी क्यूँ हुए बागी जानिये उन्ही की जुबानी

कायस्थ पाठशाला के चुनावों में अभी तक चौधरी जितेन्द्र नाथ सिंह के लिए कैम्पेन कर रहे राहुल निरखी २ दिन पहले उनके खिलाफ हो गये , सोशल मीडिया में अपने भाई अभय निरखी की आई एक पोस्ट ने पुराने जख्मो को याद करते हुए कायस्थ खबर को ये लेख भेजा है जानिए राहुल निरखी की कहने उन्ही की जुबानी यह कहानी शुरु होती है जनवरी 2006 से मेरे बडे भाई भूपेन्द्र निरखी उर्फ गांधी जी जो कांग्रेस के निष्ठावान कार्यकर्ता थे और अपनी बिरादरी के नेता के ग्रुप के साथ थे । नगर महापालिका के चुनाव होने थे । भैया अपने वार्ड से कांग्रेस के टिकट के प्रबल दावेदार थे । चूकि टिकट वितरण की जिम्मेदारी अपने बिरादरी के नेता के हाथ थी इसलिये वह आश्वस्त थे कि उनको टिकट जरुर मिलेगा । कई बार अपने नेता जी स्वयं कह चुके थे टिकट तुम्हारा पक्का है तुम काम पर लगे रहो । चुनाव का वक्त आया भाई ने परिवार और करीबी लोगो के साथ बैठ कर चर्चा की और सारी परिस्थियो से अवगत करा कर हम लोगो से पूछा कि चुनाव लडा जाये या नही ? उस मिटिंग मे कई ऐसे लोग मौजूद थे जिनके सामने अपने नेता ने गांधी जी को टिकट देने का पक्का वादा किया था मिटिंग मे तय हुआ कि अगर कांग्रेस से टिकट मिलता है तो चुनाव लडा जाये अन्यथा नही लडा जाये । स्वयं मेरे भाई का भी येही मत था । मगर चूकि जिसके हाथ मे अधिकार है वह स्वयं बार बार कह रहा था इसलिये भाई को 100 प्रतिशत विश्वास था कि टिकट उनको ही मिलेगा । चुनाव का वक्त आ गया अपने बिरादरी के नेता को कांग्रेस ने महापौर पद का प्रत्याशी बना दिया । चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ हो गयी । भाई अपने टिकट के लिये बार बार कोठी जाते रहे और हर सुबह शाम को और शाम को अगली सुबह बुलाया जाता । कई बार खुलकर पूछा कि अगर टिकट मुझको ना मिलने वाला हो तो मै अपने घरवालो को और समर्थको को बता दूँ और आपके प्रचार मे लग जाऊ मगर हर "रोज टिकट पक्का है तुम चिन्ता मत करो" जैसे जुमले के साथ वापस कर दिया जाता । नामांकन का आखिरी दिन कल था आज शाम को नेताजी ने कहा कि तुम जाकर नामांकन की तैयारी करो और सुबह 8 बजे आकर अपना टिकट वाला पत्र ले जाना । भाई ने आकर बताया तो फिर तय हुआ कि तैयारी कर लो सुबह कागज मिल जायेगा और नामांकन करा दिया जायेगा । सुबह जब भाई कोठी पर पहुचे तो नेता जी ने उनको सन्देश भेजवाया कि अशोक बाजपेयी के हस्ताक्षर के लिये कागज उनके घर गया था । मैने उनको बोल दिया है आप वहाँ जाकर जल्दी से अपना कागज लेकर नामांकन को निकल जाना । भाई कोठी से रामबाग भागे वहा वाजपेयी जी से मुलाकात ही नही हो पा रही थी । पी सी ओ से कई बार काल करने पर नेता जी मिले तो उन्होनें बोला कि आप जाकर नामांकन करवा लो शाम को मै व्यक्तिगत तौर पर आपका कागज दिलवा दुगा ।टिकट वाला कागज तो नामांकन के बाद भी दाखिल हो सकता है । उनके इस आश्वासन पर भाई घर आये । फिर नामांकन का समय ही ना निकल जाये हम लोग बिना ज्यादा विचार किये नामांकन को निकल गये । उधर मेरी बहन "सुनीता दरबारी" लूकर गंज से चुनाव लड़ने वाली थी मगर उनका सोचना भी यह था कि अगर गांधी जी चुनाव लडेगे तो वह नही लडेगी । और पूरी ताकत से भाई के चुनाव मे लगेगी । इन परिस्थियो मे मेरे भांजे Rochak Darbari वर्तमान सभासद लुकरगंज ने यह सोच कर कि अगर मामा के टिकट मे कोई गड़बड़ हुई तो मम्मी का भी नामांकन नही हो पायेगा केवल 10 लोगो के साथ आ गया अपनी मम्मी का नामांकन करवाने । पहले हम लोग गांधी जी का नामांकन करवाने हाजिर हुए उनके नामांकन के बाद हम लोग सुनीता दरबारी के नामांकन को चले गये दुशरे कमरे मे । जैसे ही सुनीता दरबारी का नामांकन करवा कर बाहर आये हम लोगो को मालुम हुआ कि हमारे वार्ड से किसी एजाज अहमद ने कांग्रेस के टिकट पर नामांकन दाखिल किया है । हम लोगो ने वहाँ जाकर मालुम किया तो मालुम हुआ कि यह खबर सही है कि एजाज अहमद ने कांग्रेस के टिकट पर नामांकन दाखिल किया है । शर्मनाक पल था वह मेरे भाई सहित हम सबके लिये बहुत सारे लोग मिल रहे थे । कई लोगो ने कहा कि कोठी जाकर नेताजी से मिलकर देखो अभी भी अधिकार उनके पास है । हम लोग वापस घर आ गये । शाम को भाई फिर कोठी गये नेता जी मिले तो उन्होने टिकट गड़बड़ करने का ठीकरा वाजपेयी के सर पर फोड दिया । एक भतीजा भी गांधी जी के साथ उस वक़्त मौजूद था । आज भो वह कहता है कि कोठी वाले नेताजी ने स्पष्ट कहा था कि तुम चिन्ता मत करो अगर मै महापौर हो गया तो तुम भी निगम सद्स्य के रुप मे मौजूद होगे । भाई घर लौट आये शर्म के मारे चुपचाप अपने कमरे मे चले गये । दो तीन दिनो तक घर से बाहर ही ना निकले घर मे भी किसी से ज्यादा बात ना करते । बडे संयुक्त परिवार का छोटा सदस्य होने की वजह से बडे लोग कुछ बोल भी देते । आज भी जब उस दिन उनका बेबस चेहरा मेरे आंखो के सामने आता है तो आखो से आशू निकल आते है । चार दिनो बाद कोठी से नेताजी का फोन आया और भाई को कोठी पर बुलाया । भाई वहा गये जो भी बात हुई हो मगर वापस आने पर थोडा नार्मल लग रहे थे । बहन सुनीता दरबारी भी घर आयी और लूकरगंज के चुनाव के बहाने अपने साथ चलने को कहने लगी । इसके बाद भाई का लूकर गंज जाने का कार्यक्रम होने लगा बीच बीच मे कोठी वाले नेता जी से भी मिलना जुल्ना होता रहा । बहन के साथ जनसम्पर्क के लिये निकालने पर भाई के जेब मे कोठी वाले नेता जी जो महापौर के प्रत्याशी थे के पर्चे होते थे । लोगो से सभासद के लिये सुनीता दरबारी और मेयर के लिये पंजे पर मोहर लगाने की अपील करते । चुनाव से एक रात पहले भांजे के पास बाहुबली नेता का सन्देश आया कि मेयर के लिये वोट दुबे जी को दिलवाना है । चूकि भांजे को अपने चुनाव से ही मतलब था इसलिये उसने मान लिया । वोटिंग के दिन सुबह से ही बाहुबली नेता के 2 आदमी जिनमे एक खतरनाक भी था पंडाल जहां पर्ची बनाई जा रही थी आकर बैठ गये । हर पर्ची लेने आने वाले को दुबे जी को मेयर के लिये वोट देने को बोल रहे थे । इधर भाई पंडाल के बाहर खडे होकर तमाम लोगो से मेयर के लिये पंजे पर वोट देने की अपील कर रहे थे । लगभग 2 घन्टे तक यह सब चलता रहा । इसके बाद बाहुवली नेता के आदमियो की निगाह मेरे भाई पर पड गयी उन लोगो ने गांधी जी पर पड गयी । उन लोगो ने गांधी जी को मना किया । भाई नही माने हम लोगो को भी लग रहा था एक ही पंडाल से दो दो लोगो के लिये अपील किया जाना गलत है । थोडी देर बाद बाहुबलो सांसद के उन आदमियो मे से एक ने ( जिसका नाम राजू पाल विधायक की हत्या मे लिया जाता है ) ने बेअदबी से भाई को ऐसा करने को मना किया । भाई उस आदमी से भीड गये । काफी कहा सुनी हो गयी । भाई बार बार कहते रहे मैने अपनी बिरादरी के नेता को वचन दिया है और मै अपना वचन निभाउगा । इसके लिये मेरी जान ही क्यो ना चली जाये । वोटिंग खतम होने तक कई बार उनलोगो से कहासुनी होती रही । वोटिंग के बाद जब वह दोनो लोग जाने लगे तो भाई से बोले " जल्दी ही आपको समझा दूगा " चुनाव का रिजल्ट आया अपनी बिरादरी के नेता महापौर चुन लिये गये । सुनीता दरबारी लूकरगंज से सभासद चुन ली गयी । कुछ दिनो बाद चौधरी गार्डेन मे शहर के सभी सभासदो की दावत की गयी थी महापौर की तरफ से कुछ और लोग भी बुलाये गये थे । भाई को भी बुलाया गया था । वहाँ बाहुबली सांसद के आदमीयो से भाई की भिड़ंत पर कई लोग बात कर रहे थे । महापौर के सामने भी कई लोगो ने यह बात बतायी । महापौर साहब ने वहाँ भी गांधी जी को निगम सदन मे बैठाने की बात कही नामीनेटेड सभासद के तौर पर । लगभग एक महिने की चुनावी गहमा गहमी खतम हो गयीं । प्राय: घर मे ना रहने वाले मेरे भाई ने घर से निकलना कम कर दिया । कुछ दिन तक थकान होने की बात कहते रहे । फिर बीमार हो गये । कई डाक्टरों के पास गये मगर कमजोरी कम नही हो रही थी । आंख मे पिलापन आ गया था । पीलिया का इलाज चला । लगभग एक महिने बाद आखो का पीलापन खतम हो गया । जिन लोगो को महापौर के गांधी जी को दिये उस आश्वासन के बारे मे मालुम हो गया था जिसमे उन्होने गांधी जी से कहा था कि आपको निगम सदन मे लिया जायेगा वह लोग गांधी जी को सभासद जी कह कर बुलाने लगे थे । इन सबके बीच गांधी जी का स्वास्थ्य सही नही हो रहा था । ना जाने क्यो दवाईया या खानपान का कोई प्रभाव शरिर पर नही दिखाई दे रहा था । फरवरी मध्य तक भाई की हालत बिगड़ती जा रही थी । डाक्टर बीमारी बता नही पा रहे थे मगर हर डाक्टर कहता था कि ज्यादा सोचिये मत । फरवरी के आखिरी मे डाक्टर बी बी अग्रवाल ने बताय की इनके फेफड़े मे पानी है । उसी दिन पानी निकाला गया इसके बाद घर भेज दिया परसो फिर आने को बोल कर । वह परसो आया मगर भोर मे ही भाई की तबियत खराब हो गयी जल्दी जल्दी उनको अस्पताल ले जाया गया । वहाँ पहुचते ही मालुम हुआ कि भाई को पैरालिसिस का अटैक हुआ है । हम लोग वहाँ से उनको जीवन ज्योती अस्पताल ले आये । ICCU मे एडमिट भाई की हालत चिन्ताजनक हो रही थी । मैने उनके मोबाइल से एक मैसज गम्भीर बीमार होने का उनके मोबाइल मे जितने नंबर थे सबको भेज दिया । लगभग 1 घन्टे बाद कोठी वाले नेता जी और मेयर साहब का फ़ोन बहन सुनीता दरबारी के मोबाइल पर आया । भाई का हाल चाल पूछा और बतया कि बंगलौर मे हूँ आर्थिक सहायता की जल्दी आ कर आप से मिलता हूँ । आर्थिक सहयता की बात किया मगर बहन ने मना कर दिया था भाई की जीवन मौत का सन्घर्ष बढता जा रहा था । 1 मार्च 2007 को भूपेन्द्र निरखी उर्फ गांधी जी जीवन मौत की लडाई हार गये । मेरे परिवार ही नही मेरे खानदान मे यह पहली घटना थी जब कोई 42 साल की आयु मे सांसारिक जिम्मेदारियों को पूरा किये बिना परलोक चला गया हो । गांधी जी के शव को हम लोग घर ले आये । घर आकर मैने उनकी मृत्यू का समाचार मैसज के जरिये उनके मोबाइल से भेज दिया । अगले दिन सुबह जब शवयात्रा की तैयारी हो रही थी । मेयर साहब का फोन आया गांधी जी के मोबाइल पर आया मुझसे बात हूई । उन्होने बताया कि मै ट्रेन मे हूँ । परसो आता हूँ आपके घर । गांधी जी के परिवार मेरा अपना परिवार होगा । उस वक्त गांधी जी का बेटा 14 साल का था । हाई स्कूल की परीक्षा मे शामिल होने वाला था । हम लोग अपने दुखो के गहरे समुद्र मे डूबे हुए थे । 82 वर्ष की मेरी माता जी अपने बेटे के गम मे रात दिन रो रही थी । 40 वर्ष की भाभी का हाल बुरा था । 14 वर्ष के लडके को पिता की चिता को आग देकर सफेद कपडे मे देखना मेरे अपने बच्चो को दुखी कर रहा था । मेयर साहब का पूरा 5 वर्षो का कार्यकाल बीत गया । मगर वह नही आये । इसके बाद विधानसभा के चुनाव आ गये । अब मेयर साहब विधान सभा के प्रत्याशी थे । अब मेयर साहब के चमचो को भी याद आ गयी गांधी जी के परिवार की । सम्बन्ध जोड़े जाने लगे परिवार से । हम परिवार के लोगो ने बैठ कर बात किया कि क्या किया जाना चाहिये । एकमत राय थी हम सबकी कि "जो नेता अपने उस समर्थक के लिये जो उसके लिये एक हिस्ट्रीशीटर से अकेले भिड जा रहा था की मृत्यू पर उसके परिवार से मिलने का समय भी ना निकाल पा रहा हो उस नेता को मात्र कायस्थ होने के नाते वोट नही दिया जाना चाहिये । " मेयर साहब की पत्नी मेरे घर तब आयी जब मुहल्ले मे जनसम्पर्क के लिये आयी । घर मे मेरी पत्नी ने उनको आदर पुर्वक बैठाया बात पुराने संबंधो की आयी तो मेरी पत्नी ने उनको गांधी जी की पूरी बात बता दिया साथ ही यह भी बता दिया कि मेयर साहब आज तक गांधी जी के परिवार का हाल लेने का समय नही निकाल पाये है । उनकी पत्नी ने भी माना कि मेयर साहब ने गलत किया है । वह कल परसो मे ही आयेगे । विधानसभा के उस चुनाव मे मुहल्ले के कायस्थों और कांग्रेसियो ने भी गांधी जी के सम्मान मे या तो वोट नही दिया और अगर दिया तो मेयर के खिलाफ दिया । बहुत सारे रिस्तेदारो ने भी ऐसा ही किया । मेयर साहब चुनाव हार गये । 2013 के ट्रस्ट के चुनाव मे मेयर साहब का बेटा मेरे घर आया । मैने अपनी शिकायत उनको बता दिया । बेटे ने पापा को मेरे घर से ही पापा को काल करके बात किया । मेयर साहब ने पहले तो यह कहा कि मै गया था । मगर बाद मे कहा कि मै लुकरगंज गया था गांधी जी की बहन के घर । दोस्तो, ना तो 2006 मे ना ही आज भूपेन्द्र निरखी " गांधी जी" का परिवार किसी का मोहताज नही था । ना ही किसी से कोई आर्थिक सहायता की दरकार थी । उनकी मृत्यू के बाद कई लोगो ने ट्रस्ट से मिलने वाली पेंशन और सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता दिल्वाने की बात कही मगर गांधी जी की पत्नी ने साफ इन्कार कर दिया। 1 मार्च 2007 से आज 2 मार्च 2018 आ गयी । पत्नी आयी, बेटा आया मगर मेयर साहब ( जिनसे संबन्ध था भाई का ) नही आये । 2 मार्च 2007 को जब गांधी जी का 14 वर्षीय बेटा दारागंज के घाट पर चिता मे आग लगा रहा था उस वक़्त मैने भी उसका हाथ पकडा हुआ था । मुझे नही मालुम कि उस वक़्त उनके लडके के दिमाग मे क्या चल रहा था । मगर मेरे दिमाग मे एक बात थी कि मेयर से मिले धोखे ने मेरे भाई को असमय चिता पर लिटा दिया । चिता ठण्डी करने के वक़्त मैने भी कसम ली थी कि धोखा देकर समाज मे बेइज्जत करने वाले नेता को समाज मे धोखा देकर नही तथ्यो के आधार पर बेइज्जत करूगा ।

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